उन्होंने काशी विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एमए और पीएचडी करने के बाद काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया। 1959 में चकिया चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से चुनाव लड़े और असफल होने के बाद बीएचयू छोड़ दिया। इसके बाद वह दिल्ली आ गए थे, यहां उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की। नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में आलोचना और साक्षात्कार विधा को नई पहचान ही नहीं बल्कि नई ऊंचाई भी दी।
डॉ सिंह से जब भी पूछा जाता कि इतने दशकों तक आलोचक के तौर पर काम करने के बाद यदि कोई इच्छा रह गई हो, जिसे आप याद करना चाहते हैं, तो वो गालिब का शेर 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले' याद करते हुए कहते थे, 'मेरी कई तमन्नाएं अधूरी हैं, क्या कहूं और क्या न कहूं और हर इच्छा बाकाफी बलवती है।'
हिंदी साहित्य पर कई दशक तक राज करने वाले डॉ. सिंह को कई बड़े सम्मानों से नवाजा जा चुका है। हिन्दी जगत में उत्कृष्ट योगदान और हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में समर्पित भाव से काम करने वाले सिंह को साल 1971 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वहीं, 1991 में उन्हें हिन्दी अकादमी के सर्वोच्च सम्मान शलाका सम्मान और 1993 में हिंदी अकादमी, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के 'साहित्य भूषण सम्मान' से पुरस्कृत किया गया था।
एक बार किसी साक्षात्कार में हिंदी साहित्य के मशहूर लेखक काशीनाथ सिंह जी से जब नामवर सिंह के बारे में पूछा गया, तो उनके भाई काशीनाथ सिंह बड़ी दिलचस्प बात बताई। उन्होंने कहा, 'मैं सन् 1953 से भइया को देख रहा हूं। असल में वे एक योगी का जीवन जीते रहे हैं। उन्हें साहित्यिक योगी कह सकते हैं। किताब-कॉपी, पढ़ाई-लिखाई के सिवा उन्होंने जीवन में कुछ जाना ही नहीं।'
आगे उन्होंने कहा, 'अपने जीवन के संदर्भ में जब वे नागफनी का जिक्र करते हैं, तो इशारा उनके संघर्षों की तरफ होता है। नागफनी में कांटे ज्यादा होते हैं। उनकी जिंदगी भी कांटों भरी रही है। दो विश्वविद्यालयों से वे निकाले गए। एक जगह उन्हें मुकदमे का भी सामना करना पड़ा। जोधपुर जाने से पहले पांच साल बेकार रहे। जिस आदमी से मिलनेवालों का दिन-रात तांता लगा रहता हो, उसका यूं अकेला पड़ जाना सालता है। पांच वर्षों तक कोई आदमी झांकने तक नहीं आया कि नामवर कैसे हैं। दूसरे, उनकी बातें भी तो कभी-कभी बहुतों के लिए नागफनी हुआ करती हैं। आलोचना में भी तो नागफनी के कांटे दिखाई पड़ते हैं, तो उसकी ओर भी इशारा है। लेकिन, असल में भइया छतनार वृक्ष रहे। एक विशाल वृक्ष। सबको छाया देनेवाले और उसी तरह अडिग भी रहे।'
काशीनाथ जी सही कहते हैं। सबको छाया देने वाला वृक्ष। वो वृक्ष जिसकी छाया अब हिन्दी साहित्य को राहत और ठंडक नहीं देगी।