1953 में उसी विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में अस्थायी पद पर उनकी नियुक्ति हुई। वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय के अनुसार, नामवर सिंह हिन्दी के जितने प्रसिद्ध आलोचक थे, उतने ही प्रसिद्ध अध्यापक भी थे। साथ ही वह उतने ही प्रसिद्ध वक्ता भी थे। उन्होंने हिंदी आलोचना को समकालीन बनाया। पांडेय के अनुसार, नामवर सिंह की एक अन्य बड़ी विशेषता थी कि वह युवा लेखकों के साथ बहुत जल्द अपना तारतम्य स्थापित कर लेते थे ।
पुस्तकों से उनका नाता सदा से ही रहा। 'घर का जोगी जोगड़' चाहे घर में रहे या बाहर, उनके दिमाग में साहित्य और किताबें सदा तैरती रहती थीं । नामवर कहते थे कि वह यह कल्पना भी नहीं कर सकते कि उनसे 'कलम और किताब छीनकर उन्हें किसी निर्जन टापू पर भेज दिया जाए। साहित्य के अलावा, नामवर कुछ समय के लिए राजनीति में भी उतरे । उन्होंने 1959 में चकिया, चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रूप में अपनी चुनावी किस्मत आजमायी। चुनाव में सफलता तो नहीं मिली। साथ ही विश्वविद्यालय की नौकरी से भी वह मुक्त हो गये ।
उनके छोटे भाई और प्रसिद्ध कहानीकार काशीनाथ सिंह के शब्दों में, यह दौर नामवर सिंह का सबसे संघर्ष भरा दौर रहा। लेकिन इस दौर में उनका पुस्तकों से नाता छूटने के बजाय और गहरा गया। उस दौर में नामवर बनारस के लोलार्क कुंड इलाके में रहते थे। एक साक्षात्कार में जब उनसे पूछा गया कि क्या उनके सपनों का कोई घर था भी या नहीं। उन्होंने बेबाकी से उत्तर दिया था, 'वही लोलार्क कुंड वाला पुराना घर, जिसमें किसी समय सभी अपने साथ थे । वैसे सचमुच का घर तो अब भी सपना है और सपना ही रहेगा।'