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भारतवर्ष का अहम व्यापारिक केंद्र थी पौराणिक अयोध्या, बनते थे हर तरह के हथियार

Wed, 05 Aug 2020 09:59 AM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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राम मंदिर का शिलान्यास - फोटो : AMAR UJALA
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प्रभु श्रीराम की अयोध्या नगरी पौराणिक काल के दौरान भारतवर्ष का एक अहम व्यापारिक केंद्र हुआ करती थी। यहां व्यापार के साथ हथियारों का निर्माण भी हुआ करता था। पशुओं को पालने और उन्नत नस्ल के पशुओं चलन था। ऐसी ही कई बातों का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है।

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कई देशों के कारोबारी आते थे
वाल्मीकि रामायण में अयोध्या नगरी के महत्व और वहां के जन-जीवन के बारे में कई जानकारियां दी गई हैं। वैभव-ऐश्वर्य से संपन्न अयोध्या उस समय एक बड़ा व्यापारिक केंद्र थी।

अयोध्याकांड के 14वें अध्याय के 80वें श्लोक में उल्लेख मिलता है कि अयोध्या नगरी कारोबारियों के लिए एक बड़ा केंद्र थी। इसमें कहा गया है- पौरजानपदश्रेष्ठा नैगमाश्च गणै: सह। यानी अयोध्या व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र थी, जहां विभिन्न देशों से कारोबारी आते थे और शिल्पी सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्र बनाया करते थे।
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युद्ध सामग्री और पशुओं का भी व्यापार
अयोध्या में सामान्य वस्तुओं के अलावा युद्ध सामग्री और पशुओं का भी कारोबार होता था। इसमें हाथी और घोड़े प्रमुख थे। कम्बोज और बाहित देश में उत्पन्न हुए सबसे बेहतर नस्ल के घोड़ों का कारोबार होता था। यहां विंध्य और हिमाचल पर्वतों में उत्पन्न होने वाले पर्वताकार मदमस्त गजराज से भी अयोध्या संपन्न थी। घोड़े और हाथी उस दौर में युद्ध में काम आने वाले पशु हुआ करते थे।



संकर नस्ल के पशुओं का भी था चलन
वाल्मीकि रामायण में उल्लेखित है कि अयोध्या में प्राचीन काल से ही संकर, यानी हाइब्रिड पशुओं का चलन था। ऐसा उत्तम किस्म के पशुओं को उत्पन्न करने के लिए किया जाता था। इनमें सबसे ज्यादा जोर गज यानी हाथियों पर होता था। इसके लिए दो सर्वश्रेष्ठ हाथियों के मिलन से तीसरी नस्ल पैदा की जाती थी, जिसमें इन दोनों के सर्वश्रेष्ठ गुण होते थे।


आगे पढ़ें रामचरित मानस से लिया गया एक दोहा

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सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुं फेर।।

अर्थात्
भगवान श्रीरामचंद्र जी के अयोध्या में आने के संकेत मात्र से सारे शगुन सुंदर होने लगे। सबके मन प्रसन्न हो गए। नगर चारों ओर से रमणीक हो गया।

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