क्या गैर-भाजपाई वोटरों को एक साथ लाने की होगी कोशिश
समाजवादी पार्टी की नेता जूही सिंह ने अमर उजाला से कहा कि पश्चिम बंगाल की परिस्थितियां अलग थीं। वहां ममता बनर्जी के सामने विपक्ष का कोई भी दूसरा बड़ा दल मजबूत स्थिति में नहीं था, लिहाजा वोटरों के पास एक स्पष्ट विकल्प था कि उसे भाजपा को वोट करना है, या ममता बनर्जी को वोट देना है। लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसी परिस्थितियां नहीं हैं। इसके पूर्व के चुनावों में कुछ दलों के साथ लड़ने की कोशिशें हुई थीं, लेकिन चुनाव परिणाम बताते हैं कि स्वयं जनता को ही यह गठजोड़ पसंद नहीं आया। इसलिए इस बार समाजवादी पार्टी अपने ही बूते पर मैदान में उतरेगी और जीत हासिल करेगी।
उन्होंने कहा कि जहां तक गैर-भाजपाई वोटरों को एक साथ लाने की बात है, हम समाज के सभी वर्गों को एक साथ लेकर चलते रहे हैं और इस बार भी हमारी कोशिश होगी कि हम समाज के सभी वर्गों को एक साथ लें। यह काम केवल बातों में नहीं होगा, बल्कि टिकट वितरण में भी यही बात दिखाई पड़ेगी। पूर्व में भी हमने समाज के सभी वर्गों को एक साथ लाने की कोशिश की है और हमें उम्मीद है कि जनता हमें अपना विश्वास देगी।
काम नहीं आएगा बंगाल फार्मूला- भाजपा
भारतीय जनता युवा मोर्चा अवध प्रांत के उपाध्यक्ष शैलेन्द्र शर्मा कहते हैं कि बंगाल फॉर्मूला उत्तर प्रदेश में सफल नहीं हो सकता। यहां सपा-बसपा और कांग्रेस अलग-अलग तरीके से साथ आकर चुनाव लड़कर देख चुके हैं। ये सभी प्रयोग यहां असफल साबित हुए हैं क्योंकि जनता ने इस तरह की किसी सोच को नकार दिया है। इस चुनाव में भी विपक्ष के साथ आने की कोई संभावना बनती नहीं दिखाई दे रही है।
दूसरी बात, विपक्ष के तमाम दुष्प्रचार के बाद भी जनता ने यह देखा है कि योगी आदित्यनाथ सरकार ने किस प्रकार से कोरोना काल में लोगों की मदद की है। केवल एक महीने में कोरोना के मामले 40 हजार से घटकर चार हजार पर आ गये हैं। इसी दौरान जनता की मदद के हर संभव उपाय किये गये हैं और लोगों को राशन-रोजगार की मदद की गई है। उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि योगी आदित्यनाथ सरकार को जनता का पूरा विश्वास मिलेगा और भाजपा फिर से प्रचंड ताकत से सरकार बनाएगी।
सभी को साथ लेकर जीतेंगे चुनाव
वहीं, राष्ट्रीय लोकदल के महासचिव तारिक मुस्तफा का कहना है कि जनता ने बार-बार यह दिखा दिया है कि वह किसी एक दल को नहीं चुनती। मुस्लिम मतदाताओं के मामले में भी अलग-अलग समीकरणों में उसकी पसंद बदलती रही है। इस बार भी जो उसके लिए बेहतर उम्मीदें लेकर आएगा, उसका साथ उसी को मिलेगा। उन्होंने कहा कि मुस्लिम मतदाताओं के लिए वही पसंद बनेगा जो उनके लिए विकास की ज्यादा बेहतर संभावना पैदा कर सकेगा।
उन्होंने कहा कि उम्मीदवारों के आधार पर ही मुस्लिम मतदाता यह तय कर सकते हैं कि उनकी पसंद में पहले नंबर पर कौन आ सकता है, लेकिन अभी से इसकी अटकलबाजी कर पाना मुश्किल है। उन्होंने दावा किया कि समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल अभी से इस वर्ग की पहली पसंद बने हुए हैं।
मुस्लिम जनसंख्या कितनी
माना जाता है कि मुस्लिम समुदाय के लोग भाजपा के पक्ष में बहुत कम मतदान करते हैं। अगर किसी दल विशेष के पक्ष में यह मतदाता घूम जाए तो उसके लिए यह वोट बैंक एक बड़ी लीड साबित हो जाती है। यही कारण है कि सभी दल इन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं।
वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में हिदुओं की जनसंख्या 79.73 फीसदी और मुस्लिमों की जनसंख्या 19.3 फीसदी के करीब थी। मुस्लिम शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक सभी जगह कम-अधिक संख्या में रहते हैं, लेकिन कुछ जिले ऐसे हैं जहां इनकी आबादी काफी अधिक है और यही किसी मतदाता की जीत या हार का निर्णय करते हैं।
अनुमान है कि मुरादाबाद में 50.80 फीसदी, रामपुर में 50.57 फीसदी, सहारनपुर में 41.97 फीसदी, मुजफ्फरनगर में 41.11 फीसदी, शामली में 41.73 फीसदी, अमरोहा में 40.78 फीसदी, बागपत में 27.98 फीसदी, हापुड़ में 32.39 फीसदी, मेरठ में 34.43 फीसदी, संभल में 32.88 फीसदी, बहराइच में 33.53 फीसदी, बलरामपुर में 37.51 फीसदी, बरेली में 34.54 फीसदी, बिजनौर में 43.04 फीसदी और अलीगढ़ में 19.85 फीसदी आबादी मुस्लिम है। इन जिलों में उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला बहुत हद तक मुस्लिम मतदाताओं के ही हाथ में होता है।
जबकि अन्य जिलों जैसे अमेठी में 20.06 फीसदी, गोंडा में 19.76 फीसदी, लखीमपुर खीरी में 20.08 फीसदी, लखनऊ में 21.46 फीसदी, मुऊ में 19.46 फीसदी, महाराजगंज में 17.46 फीसदी, पीलीभीत 24.11 फीसदी, संत कबीर नगर में 23.58 फीसदी, श्रावस्ती में 30.79 फीसदी, सिद्धार्थनगर में 29.23 फीसदी, सीतापुर में 19.93 फीसदी और वाराणसी में 14.88 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है। अन्य जिलों में यह आबादी 10 से 15 फीसदी के बीच है। इनकी यही संख्या किसी भी राजनीतिक दल को इन्हें अपने साथ लेने पर मजबूर कर देती है।