इंसान भूल गया है…
समंदर सिर्फ खारा पानी नहीं।
हमारे घर का बुज़ुर्ग है,
जिसके पेट में ठूंस दिए गए हैं
हमारे घरों के कूड़ेदान, प्लास्टिक के ढेर,
केमिकल के दाग और गंदगी के ढेर।
आओ इज्जत दें अपने घर के बुज़ुर्ग को,
जो पी गए हमारे जुल्मों को,
फिर भी हमारी नस्लों को सींचेंगे।
और वही नहीं… इस शहर का कौन-सा वो गम है जो
समंदर किनारे बैठ के धुल नहीं जाता।
इनके साथ- अमीर हो या गरीब,
अपने दर्द में सम्भल नहीं आता।
ये समंदर तो बादलों का गीत है, इंसान का मीत है।
हर राज छुपा लेता है… यही इसकी रीत है।
इसी में तो हम भगवान डुबोते हैं,
इसी में तो हम अरजुएं बोते हैं।
कि नजर जाए जहां तक, मेरा आसमान हो वहां तक।
वरना अर्बनाइजेशन के इस दौर में सूरज-आसमान मांगने वाले हम कौन होते हैं।
इन जहरीली परतों को हटाओ,
तभी समंदर रहेगा साफ।
क्योंकि यही देता है नसीब की बारिशें,
मां की तरह है ये माफी मांग लो।
वरना बाप की तरह भी है… खुद जान लो।
यही समंदर देगा दुआ भी,
और यही समंदर देगा बददुआ भी।
इसमें भगवान भी समाते हैं,
और इंसान सुकून पाते हैं।
ये समंदर नहीं- जन्नत है।
कान बंद मत करना, समंदर को जरूर सुनना,
ये कह रहा है-
प्लास्टिक मेरा दुश्मन है,
इसे मेरे नजदीक न लाएं।
हम समंदर के नहीं,
समंदर हमारे हैं।
आज समुद्र के साथ हम सब
गुफ्तगू करने आए हैं।