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Mumbai Attack: आतंकी 'कसाब' ने ITBP IG की बेटी को मारी थी गोली, पिता ने उसकी सुरक्षा में नहीं होने दी चूक

जितेंद्र भारद्वाज
Updated Tue, 26 Nov 2024 11:23 AM IST

सार

Mumbai Attack: मुंबई में 26 नवंबर 2008 को समुद्र के रास्ते से आए लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकवादियों के हमले में 166 लोग मारे गए थे। इस दौरान आतंकवादियों से लड़ते हुए 18 सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे।
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Mumbai Attack - फोटो : Amar Ujala


आईटीबीपी अधिकारी रहे भुर्जी के लिए 26 नवंबर 2008 का हमला, कभी न भूलने वाला रहेगा। उन्होंने अपनी जिस लाडली को गोद में खिलाया, अंगुली पकड़ कर उसे चलना सिखाया। इसके बाद वह दिन भी आया, जब वह पिता अपनी बेटी के हाथ पीले करने की तैयारी करने लगे। उसे नहीं मालूम था कि उसकी बेटी, मुंबई के आतंकी कसाब की गोली का निशाना बन जाएगी। उस हमले में कसाब गिरफ्तार कर लिया गया था। मुंबई की जिस जेल में कसाब को रखा गया, उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी, आईटीबीपी को सौंपी गई। आईटीबीपी में आईजी रहे पिता के सामने, ड्यूटी व जज्बात, इनमें से किसी एक राह पर चलने की चुनौती थी। बेटी जैसमीन को खो चुके पिता ने जज्बात पर काबू पा अपनी ड्यूटी को तव्वजो दी।

 

बता दें कि मुंबई हमले के आरोपी 'कसाब' की सुरक्षा की जिम्मेदारी केंद्रीय अर्धसैनिक बल 'आईटीबीपी' को सौंपी गई थी। उस वक्त आईटीबीपी के तत्कालीन आईजी (ऑपरेशन) एमएस भुर्जी थे। जेल में कसाब की सुरक्षा की जिम्मेदारी, भुर्जी के कंधों पर ही थी। अपनी बिटिया के हत्यारे को फांसी के फंदे पर लटकने तक उन्होंने कसाब की सुरक्षा करने में कोई चूक नहीं होने दी। भुर्जी, 2017 में आईटीबीपी से रिटायर हुए थे। 


मुंबई के 26/11 के हमले के दौरान होटल ओबरॉय ट्रायडेंट में आतंकवादियों की पहली गोली रिसेप्शन पर मौजूद जैसमीन को लगी थी। कसाब की फांसी के बाद उस पिता के दिल को थोड़ा सुकून मिला, जिसने उसकी लाडली जैसमीन को छीन लिया था। कई वर्ष पहले हुई बातचीत में एमएस भुर्जी का कहना था कि घाव अभी नहीं भरे। थोड़ा सुकून इसलिए है कि निर्दोष लोगों को मारने वाले कसाब की फांसी से वे देश सबक लेंगे, जो तोड़फोड़ की मंशा रखते हैं। उन्होंने बताया था, होटल प्रबंधन की पढ़ाई करने के बाद जैसमीन, ताज मुंबई में ट्रेनिंग के लिए गई थी। हमें ही नहीं, बल्कि परिवार और रिश्तेदारों को भी वह खूब हंसाती थी। बेशक वह फोन पर बात करती, मगर ऐसा लगता था कि जैसे सामने बैठकर बोल रही है। ड्यूटी के दौरान भी उसका यह अंदाज नहीं बदला। 


मोहाली में अंतिम संस्कार के वक्त होटल प्रबंधन से आए अधिकारियों ने जब परिवार के साथ उसकी यादें सांझा की तो कोई अपने आंसू नहीं रोक पाया था। एमएस भुर्जी ने कहा, इस तरह के मामलों का निपटारा होने में दशक लग जाते हैं। कसाब के मामले में कानून की चुस्ती-फुर्ती काबिल-ए-तारीफ है। यह फैसला एक उदाहरण बनना चाहिए। हम बदले की भावना से काम नहीं करते। खासतौर से आतंकियों का समर्थन करने वाले देश अब यह सोचें कि भारत इस तरह का निर्णय भी ले सकता है। मुंबई की आर्थर रोड जेल में पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब की सुरक्षा पर आईटीबीपी के 34 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इस राशि का भुगतान होने में कई साल लग गए। लम्बे समय तक महाराष्ट्र सरकार और गृह मंत्रालय यही तय नहीं कर पाए कि इस राशि का भुगतान कौन करेगा। आईटीबीपी के दो सौ कमांडों कसाब की सुरक्षा में लगे थे। 


कसाब के मामले की सुनवाई के लिए जेल में जो खास सुरंग बनाई गई थी, उसे बमरोधी बनाने के लिए भी आईटीबीपी ने ही प्लान तैयार किया था। कुछ अफसरों का यह भी मानना था कि कसाब की सुरक्षा पर खर्च हुए करोड़ों रुपये प्रत्यक्ष तौर से व्यर्थ चले गए। भारत-चीन सीमा या नक्सलवाद प्रभावित इलाकों में आईटीबीपी के जवान लगते तो उनका सार्थक नतीजा भी सामने आता। इतना ही नहीं, कसाब की सुरक्षा पर खर्च हुई राशि से 22600 एके-47 या फिर एक्स-95 जैसे अत्याधुनिक हथियार खरीदे जा सकते थे।

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