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मुख्यमंत्री बिहार के: इस सीएम को कभी कहा गया जमींदारों का दुश्मन, छात्र आंदोलन में चली गोली ने छीन ली कुर्सी

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 08 Jul 2025 09:51 AM IST

सार

अमर उजाला की विशेष सीरीज 'मुख्यमंत्री बिहार के' की तीसरी कड़ी में आज बात बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय की। एक कायस्थ नेता जो अपनी राजनीति के बलबूते पर न सिर्फ जातीय समीकरणों को साधने के मास्टर साबित हुए, बल्कि मुख्यमंत्री भी बने।
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बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय। - फोटो : अमर उजाला
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर घमासान मचा हुआ है। सियासी दल अपनी तैयारियों में लगे हैं। इन सबके बीच अमर उजाला की विशेष सीरीज 'मुख्यमंत्री बिहार के' की तीसरी कड़ी में आज बात बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय की। वही, केबी सहाय, जिनकी बात हमने बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा की कहानी की थी। 

केबी सहाय बिहार की राजनीति में एक प्रमुख कायस्थ नेता थे। बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा के निधन के बाद बिनोदानंद झा के साथ वे भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। वो बात अलग है कि बीएन झा उस दौरान सीएम बन गए और उन्होंने ऐसे जातीय समीकरण बिठाए कि केबी सहाय का राजनीतिक करियर लगभग समाप्त माना जाने लगा। हालांकि, सहाय दूसरी मिट्टी के नेता थे और अपनी राजनीति के बलबूते न सिर्फ जातीय समीकरणों को साधने के मास्टर साबित हुए, बल्कि मुख्यमंत्री भी बने।
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बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय। - फोटो : अमर उजाला
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर घमासान मचा हुआ है। सियासी दल अपनी तैयारियों में लगे हैं। इन सबके बीच अमर उजाला की विशेष सीरीज 'मुख्यमंत्री बिहार के' की तीसरी कड़ी में आज बात बिहार के चौथे मुख्यमंत्री कृष्ण बल्लभ सहाय की। वही, केबी सहाय, जिनकी बात हमने बिहार के तीसरे मुख्यमंत्री बिनोदानंद झा की कहानी की थी। 

केबी सहाय बिहार की राजनीति में एक प्रमुख कायस्थ नेता थे। बिहार के पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा के निधन के बाद बिनोदानंद झा के साथ वे भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। वो बात अलग है कि बीएन झा उस दौरान सीएम बन गए और उन्होंने ऐसे जातीय समीकरण बिठाए कि केबी सहाय का राजनीतिक करियर लगभग समाप्त माना जाने लगा। हालांकि, सहाय दूसरी मिट्टी के नेता थे और अपनी राजनीति के बलबूते न सिर्फ जातीय समीकरणों को साधने के मास्टर साबित हुए, बल्कि मुख्यमंत्री भी बने।

ऐसा था कृष्ण बल्लभ सहाय का शुरुआती जीवन
कृष्ण बल्लभ सहाय का जन्म 31 दिसंबर 1898 को बिहार के पटना जिले के शेखपुरा में हुआ था। वे बिहार में दारोगा के पद पर तैनात मुंशी गंगा प्रसाद के सबसे बड़े बेटे थे। पिता की नौकरी हजारीबाग में होने की वजह से उनका लगभग पूरा शुरुआती जीवन हजारीबाग में ही बीता। उन्होंने यहीं से 1919 में बीए ऑनर्स की पढ़ाई पूरी की। 

इसी बीच वे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए। इस दौरान उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ न सिर्फ सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया, बल्कि बिहार में भारत छोड़ो आंदोलन का भी प्रमुख चेहरा बने। यही वह समय था, जब वे महात्मा गांधी के संपर्क में आए। 1930 के दौर में तो सहाय को चार बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी।

बिहार में हजारीबाग (अब झारखंड का हिस्सा) लंबे समय तक केबी सहाय की कर्मभूमि रहा। सहाय ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान श्रीकृष्ण सिन्हा और अनुग्रह नारायण सिंह के साथ भी काम किया। 1937 में जब अंग्रेजों ने भारत के लोगों को प्रांतीय स्तर पर थोड़ी ताकत देने का फैसला किया तो बिहार में पहली बार कांग्रेस की सरकार बनी। श्री कृष्ण सिन्हा तब ही पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। सिन्हा को केबी सहाय का काम इतना अच्छा लगा कि उन्हें सीएम के सचिव पद पर साथ रख लिया। 

यहां पढ़ें: मुख्यमंत्री बिहार के: बेटे को लड़ाने की मांग पर चुनाव में न उतरने की धमकी दी, तिजोरी में मिली इतनी 'संपत्ति'

केबी सहाय की वजह से देश से पहले बिहार में खत्म हुई थी जमींदारी प्रथा
केबी सहाय देखते ही देखते राजनीतिक गलियारों में लोकप्रिय होते चले गए। इसकी एक वजह उनका जमींदारी प्रथा के खिलाफ विरोध भी था। बताया जाता है कि बिहार में आजादी से पहले खेतीहर आदिवासियों की जमीनों पर धीरे-धीरे जमींदारों का कब्जा बढ़ रहा था। इसकी वजह अंग्रेजों के ढीले कानून थे। ऐसे में जब ब्रिटिश शासन का भारत से जाना तय हो गया और बिहार में अंतरिम सरकार का गठन हो गया तो श्रीबाबू ने राजस्व विभाग सौंपा केबी सहाय के हाथों में। जमींदारी प्रथा को खत्म करने के लिए सहाय ने भी दिन-रात एक कर दिए और इस तरह राज्य में आया जमींदारी प्रथा उन्मूलन कानून या बिहार जमीन सुधार कानून। 

इस तरह बिहार देश के किसी अन्य राज्य से पहले जमींदारी प्रथा के खिलाफ कानून लाने वाला पहला राज्य बना। हालांकि, जमींदारी उन्मूलन कानून को बाद में पटना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी नहीं मिल पाई। लेकिन देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू सहाय की दृढ़ता से इतने प्रभावित थे कि बाद में भारत का पहला संविधान संशोधन इसी सिलसिले में लाया गया। इसी के चलते हजारीबाग की रियासत के राजा कामाख्या नारायण सिंह और दरभंगा के कामेश्वर सिंह से भी उनकी ठनी रही। बाद में इन्हीं कामाख्या नारायण सिंह की वजह से केबी सहाय को राजनीतिक स्तर पर जबरदस्त चुनौतियां मिलीं। यहां तक कि उन्हें हार का सामना भी करना पड़ा। 

 

1952 में जीत गए चुनाव, पर 1957 में कामाख्या नारायण सिंह ने हराया
1952 का विधानसभा चुनाव केबी सहाय ने दो सीटों से लड़ा। एक सीट थी बड़कागांव और दूसरी गिरिडीह। बताया जाता है कि जमींदार इस दौर तक सहाय से इस कदर नाराज थे कि उन्हें दोनों सीटों से हराए जाने के लिए लामबंदी तक शुरू हो गई थी। इन स्थितियों को भांपते हुए बड़कागांव में खुद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की तरफ से सहाय के लिए प्रचार किया गया। हालांकि, इस कायस्थ नेता को यहां हार मिली। लेकिन गिरिडीह ने उनकी लाज बचा ली। इसके साथ उनका फिर से बिहार का राजस्व मंत्री बनना तय हो गया। 

पांच साल बाद 1957 के चुनाव में वे गिरिडीह से भी हार गए। उन्हें हराने वाले थे कामाख्या नारायण सिंह। आलम यह था कि कामाख्या नारायण सिंह के राजनीतिक दल के आगे हजारीबाग जिले में कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। बताया जाता है कि इस हार ने केबी सहाय को काफी दुखी किया। हालांकि, वे आसानी से हार मानने वाले नेता नहीं थे। इस बार उन्होंने अपनी कर्मभूमि की जगह अपनी जन्मभूमि पटना से चुनाव लड़ने का फैसला किया। यहां उन्हें जीत मिली और इस तरह केबी सहाय फिर विधायक के तौर पर राजनीति में लौटे। 


तस्वीर: राजेश सहाय, ब्लॉग 

फिर शुरू हुई मुख्यमंत्री पद को लेकर जद्दोजहद
1962 में जब सहाय विधानसभा में लौटे, तब तक हालात काफी बदल चुके थे। दरअसल, उनके करीबी नेता रहे श्रीकृष्ण सिन्हा का निधन हो चुका था और नई सरकार के गठन के दौरान कई नेता मुख्यमंत्री पद पर दावेदारी पेश कर रहे थे। इनमें एक नाम ब्राह्मण नेता बिनोदानंद झा का और दूसरा नाम भूमिहार नेता महेश प्रसाद सिन्हा का था। केबी सहाय भी इस रेस में थे। हालांकि, तब जीत मिली थी बीएन झा को। 



यहां पढ़ें कहानी: मुख्यमंत्री बिहार के: जिस सीएम जिसने कहा- जहरीली मछली से जा सकती है मेरी जान; कामराज प्लान ने ले ली थी कुर्सी

खैर जहरीली मछली कांड की वजह से बिनोदानंद झा को खासा नुकसान हुआ और वे कामराज्ड हो गए। अब बिहार में मुख्यमंत्री की कुर्सी फिर खाली थी और जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई। चूंकि बिनोदानंद झा पहले ही अपने उत्तराधिकारी के तौर पर कुर्मी नेता वीरचंद पटेल का नाम आगे कर चुके थे। इसलिए पटेल ने भी बिना समय गंवाए पिछड़े वर्ग को साथ लाने की कोशिश शुरू कर दी। बीएन झा का मानना था कि अगर उन्हें समर्थन देने वाला ब्राह्मण समुदाय, पिछड़ों का समर्थन जुटा रहे वीरचंद को समर्थन दे दे तो सत्ता उन्हीं के नियंत्रण में रहेगी। हालांकि, कृष्ण बल्लभ सहाय खुद सक्रिय हो गए। 

सहाय ने इस बार बिना कोई गलती करते हुए कायस्थ, कुर्मी-कोइरी और यादव जाति के नेताओं को अपने साथ मिलाने की कोशिशें शुरू कर दीं। उनकी यह कोशिशें रंग भी लाईं और बिहार में इस जातीय ढांचे को 'त्रिवेणी संगम' के तौर पर पहचाना गया। इस नई व्यवस्था के जरिए सहाय ने ब्राह्मण-राजपूत और भूमिहार समूहों को मुश्किल में डाल दिया। आखिरकार इस जातीय राजनीति की बदौलत 2 अक्तूबर 1963 को केबी सहाय मुख्यमंत्री बनने में सफल हुए। 

आसान नहीं रही मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए राह
मुख्यमंत्री के तौर पर सहाय का कार्यकाल साढ़े तीन साल का रहा। इस दौर तक सहाय और महेश प्रसाद सिन्हा के बीच दूरियां बढ़ गई थीं और इसे लेकर शिकायतें कांग्रेस आलाकमान तक पहुंचने लगीं थीं। बताया जाता है कि केबी सहाय मुख्यमंत्री रहने के दौरान ही कांग्रेस के संगठन चुनावों को भी प्रभावित करने लगे थे। सहाय पर इस दौरान तानाशाही से प्रशासन चलाने के आरोप लगने लगे और महेश प्रसाद सिन्हा से उनका टकराव भी बढ़ता रहा। 

टिकट बंटवारे में गड़बड़ियों के लगे आरोप
इस दौरान लोकसभा चुनाव के लिए टिकट बंटवारे का समय आया। केबी सहाय के धड़े ने इसमें कई प्रमुख नेताओं को टिकट नहीं दिया। इन नाराज नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर 'जन कांग्रेस' पार्टी बना ली। इसी दौरान रार विधानसभा चुनाव के प्रत्याशियों को लेकर भी बढ़ने लगी। 31 दिसंबर 1966 को चुनाव से कुछ समय पहले महामाया प्रसाद सिन्हा और रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह कांग्रेस से नाराज होकर अलग हो गए। इन लोगों ने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी- जन क्रांति दल बना लिया। यह जन क्रांति दल आगे बिहार में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनाने की धुरी बना। 

बिहार कांग्रेस में पड़ी इस फूट का नतीजा आखिरकार 1967 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। 26 फरवरी 1967 की तारीख को बिहार के एक लोकप्रिय अखबार 'इंडियन नेशन' के संपादक ने कहा था- आम चुनाव से ठीक पहले बिहार में कांग्रेस कहां है? वहां तो असल में एक बहुसंख्यक समूह और एक अल्पसंख्यक समूह है और बीच में कई उप-समूह हैं। तब कहा जाता था कि बिहार में नाराज कांग्रेसियों ने पार्टी को कमजोर करने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके अलावा जिन्हें टिकट नहीं मिले, उन्हें पार्टी की जीत-हार से भी फर्क पड़ता नहीं दिख रहा था। उल्टा वे आधिकारिक उम्मीदवारों को हराने की कोशिश में ही जुटे थे। 

देश पर पड़े आर्थिक बोझ से जूझा बिहार
बताया जाता है कि कांग्रेस की इस हार में कुछ और कारण भी थे। मसलन 1962 के भारत-चीन युद्ध और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के चलते पहले ही भारत की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई थी। इस बीच 1965 और 1966 में बिहार में मानसून में कमी भी देखी गई, जिसकी वजह से फसलों की पैदावार काफी कम हो गई और राज्य में सूखे के हालात पैदा हो गए।  मुख्यमंत्री की तरफ से केंद्र सरकार से मदद की भी मांग की गई। हालांकि, स्थिति में सुधार न होने के बाद सहाय सरकार के खिलाफ जनाक्रोश बढ़ता चला गया। इस दौरान तक जहां अनाज के दाम आसमान छू रहे थे, तो वहीं सरकारी कर्मी महंगाई भत्ता न बढ़ाए जाने की शिकायत के साथ सड़कों पर थे। इस सिलसिले में 9 अगस्त 1966 को बिहार बंद काफी सफल रहा था। सरकार विपक्ष की लामबंदी को लेकर चिंतित हो गई। यहां भीड़ का नेतृत्व कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी (संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी) और चंद्र शेखर सिंह (भाकपा) कर रहे थे। यह तीनों ही नेता बाद में बिहार की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार में मंत्री भी बने थे।    

छात्र आंदोलन सरकार पर पड़ा भारी
दिसंबर 1966 से  जनवरी 1967 के बीच सहाय सरकार के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन शुरू किया। यह प्रदर्शन पटना से मुजफ्फरपुर और समस्तीपुर तक फैल गए। ठीक इसी दौरान राज्य सरकार ने अशांति का हवाला देते हुए यूनिवर्सिटी, स्कूल और कॉलेजों को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का फैसला कर लिया। इससे नाराज छात्रों ने शिक्षण संस्थान से बाहर निकल कर खुलेआम कांग्रेस को हराने और लोकतंत्र को बचाने के लिए आंदोलन छेड़ दिया। 5 जनवरी को जब पटना की यूनिवर्सिटी में छात्रों का प्रदर्शन चल रहा था तो इसमें अचानक हिंसा भड़क उठी। पुलिस ने हिंसा को रोकने के लिए गोली चला दी। गोलीकांड में कुछ छात्रों की मौत हुई और कुछ घायल भी हुए। इसका असर यह हुआ कि पूरे बिहार में छात्र सरकार के खिलाफ एकजुट हो गए। विपक्ष ने भी कांग्रेस सरकार को खूब घेरा और एक सम्मिलित विपक्षी गठबंधन बनाने की नींव यहीं से पड़ी। 

…और इस तरह हुआ मुख्यमंत्री पर सहाय के कार्यकाल का अंत
गोलीबारी की घटना के बाद कांग्रेस आलाकमान ने सहाय को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाया। हालांकि, इसकी कीमत पार्टी को फरवरी 1967 में हुए विधानसभा चुनाव में चुकानी पड़ी। 318 सीटों में कांग्रेस को महज 128 सीटें मिलीं। वहीं, विपक्षी गठबंधन ने बहुमत हासिल कर लिया। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) को 68 सीट पर जीत मिली। इसके अलावा जनसंघ को 26, भाकपा को 24 और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (पीएसपी) को 18 सीटें मिली। महामाया प्रसाद के जन क्रांति दल ने इस चुनाव में 13 सीटें जीतीं और इसके साथ ही बिहार में कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए साथ आया संयुक्त विधायक दल। 

यूं तो कांग्रेस बिहार में इस बार भी सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। लेकिन विपक्षी दलों की एकजुटता के चलते उसे सत्ता से बाहर होना पड़ा। इस चुनाव में मुख्यमंत्री केबी सहाय दो जगहों से चुनाव लड़े थे। एक- पटना पश्चिम और दूसरा- हजारीबाग से। पटना से छात्रों के हिमायती माने जाने वाले जन क्रांति दल के नेता महामाया प्रसाद सिन्हा ने सीएम को चुनौती दी। वहीं, हजारीबाग से 10 साल पहले सिन्हा को हराने वाले रामगढ़ के राजा कामाख्या नारायण सिंह भी जन क्रांति दल के बैनर तले मैदान में थे। इन दोनों ही सीटों पर केबी सहाय को हार मिली। 

सहाय को जिस जन क्रांति दल ने दोनों सीटों पर हराया, वह बाद में 13 सीटें पाने के बावजूद संयुक्त विपक्ष का चेहरा बनी और केबी सहाय को हराने वाले महामाया प्रसाद सिन्हा बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने। इस तरह केबी सहाय का मुख्यमंत्री के तौर पर साढ़े तीन साल तक चले कार्यकाल का अंत हुआ। 1974 में कृष्ण बिहार सिन्हा ने अपना आखिरी चुनाव हजारीबाग से विधान परिषद के लिए लड़ा। वे इसमें जीत भी गए। हालांकि, 5 मई 1974 को पटना से हजारीबाग जाते वक्त एक सड़क दुर्घटना में उनका निधन हो गया।
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