अपनी क्लासिक फिल्मों के मास्टर प्रिंट नष्ट होने से व्यथित मृणाल ने बताया था कि सत्तर के दशक में बनी प्रतिदिन, कलकत्ता 71 और खंडहर जैसी 1984 में बनी फिल्म के प्रिंट भी नष्ट होने की कगार पर हैं। फिल्मों के संरक्षण की बात वे कई साल से कहते रहे हैं। मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं उन्हें बचा सकूं। वह कहते थे कि फिल्में हमारी धरोहर हैं। हम अपनी धरोहर को यूं खो नहीं सकते।
सत्यजीत रे की कालजई फिल्म पाथेर पांचाली के मास्टर प्रिंट भी लंदन फिल्म महोत्सव के दौरान खराब हो गए थे। फोर्ड फाउंडेशन ने लाखों रुपये खर्च करके उसे बचाया था। मृणाल की फिल्मों पुनश्च (1961) और प्रतिनिधि (1964) के मास्टर प्रिंट भी नष्ट हो चुके हैं। उन्होंने कहा था कि यह दुखद है, लेकिन मुझे सच्चाई को स्वीकार करना ही होगा।
आखिरी बार 2002 में आमार भुवन नाम की फिल्म बनाने वाले मृणाल ने निर्देशन का दामन नहीं छोड़ा था, लेकिन उन्हें सही पटकथा का इंतजार था। इस फिल्मकार ने तब कहा था कि वह रोज सुबह उठने पर नई पटकथा लिखने के बारे में सोचते हैं। बीते सात साल से ऐसा ही कर रहे हैं, लेकिन पता नहीं सही कहानी कब मिलेगी।
अपनी सृजनात्मक क्षुधा को कैसे शांत करते हैं? इस सवाल पर उन्होंने कहा था कि मैं ऐसी बहुत सी चीजें करना चाहता हूं जो नहीं कर पाया। अपनी हर फिल्म को जब मैं देखता हूं तो मुझे वह ड्रेस रिहर्सल लगती है। मुझे लगता है कि इससे बेहतर कर सकता था। लगता है कि काश अपनी जिंदगी को दोबारा जी सकता और अधिक फिल्में बना सकता।