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'मुसलमानों को मां ने बचाया, बेटे ने मारा'

Sat, 18 Jun 2016 02:11 PM IST
अंकुर जैन/ अहमदाबाद बीबीसी
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गुलबर्ग सोसायटी
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गुजरात दंगों के दौरान गुलबर्ग सोसायटी कांड में जिन 11 लोगों को उम्र कैद की सजा मिली है, उनमें कृष्णा कलाल का मामला शायद सबसे अलग है। इसकी वजह ये है कि कृष्णा कलाल की मां चंपाबेन ने 2002 दंगों के दौरान मुस्लिमों की जान बचाई थी।
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वहीं उनके बेटे कृष्णा कलाल को गुलबर्ग कांड के दौरान हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया है। चंपा बेन एक सरकारी अस्पताल में सफाई कर्मचारी हैं और उन्होंने गोधरा दंगों के दौरान अपने घर में दो मुस्लिम लोगों को पनाह दी थी। गोधरा दंगा भड़कने के बाद 28 फरवरी, 2002 को जब हिंसक भीड़ ने गुलबर्ग सोसायटी को घेर लिया था तब रहीम खान पठान और उनके बेटे मुशी खान पठान जान बचाकर भागते हुए गांधी चॉल आए थे। ये चॉल गुलबर्ग सोसायटी से 200 मीटर की दूरी पर था।

इसी चॉल में चंपाबेन का परिवार रहता था। चंपाबेन ने बीबीसी को बताया, "मैंने रहीम खान और उनके बेटे को अपने घर में पनाह दी। पुलिस आने तक इन दोनों को छिपाए रखा।" चंपाबेन के इस दावे की पुष्टि एसआईटी अदालत में सुनवाई के दौरान एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह ने भी की थी। इब्राहिम चंडेल नामक यह गवाह रहीम खान और उनके बेटे के साथ पुलिस के शरणार्थी कैंप में रहा था। 
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जो थप्‍पड़ नहीं लगा सकता वह मर्डर कैसे करेगा?

गुलबर्ग सोसायटी
गुलबर्ग कांड में कलाल को सबसे पहले जमानत मिली। जमानत मिलने के बाद कलाल ने ऑटो रिक्शा चलाना शुरू किया। परिवार में कलाल की पत्नी के अलावा दो बच्चे भी हैं। इनमें 15 साल की बेटी और नौ साल का बेटा शामिल है।

कलाल की बेटी तान्या, अपने पिता के मामले की सुनवाई के दौरान दादी के साथ विशेष अदालत आती रहीं हैं। अब उसका इरादा वकील बनना का है। चंपाबेन ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "मुझे लगता है कि मेरे बेटे को इस मामले में फंसाया गया है। मेरे बेटे ने तो किसी शख्स को थप्पड़ भी नहीं लगाया होगा।"

वहीं तान्या ने भी बातचीत में कहा, "उनके पिता को न्याय नहीं मिला। मैं वकील बनकर उन लोगों को न्याय दिलाना चाहती हूं जिन्हें पुलिस गलत मामलों में फंसा देती है और न्याय हासिल करने के लिए उनके पास पैसे नहीं होते।" Published by Abhishek
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