लॉकडाउन का सबसे गहरा असर असंगठित क्षेत्र और इसमें काम करने वाले मजदूरों पर पड़ा है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में लॉकडाउन लागू होने के बाद न्यूनतम 52 फीसदी मजदूरों को मार्च, अप्रैल और मई में कम से कम एक महीने का वेतन नहीं मिला है। मजदूरों की आमदनी प्री-लॉकडाउन पीरियड की तुलना में आधे से भी कम रह गई है।
श्रमिक संगठनों का आरोप है कि लॉकडाउन घोषित होते ही कंपनियों और ठेकेदारों ने अपने गैर-पंजीकृत मजदूरों को बिल्कुल भी पैसा नहीं दिया। केवल पंजीकृत 35 फीसदी मजदूरों को ही मार्च महीने का वेतन मिल पाया है, जबकि अप्रैल और मई के दौरान इनमें से भी भारी संख्या में मजदूरों को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल पाई। मजदूरों के वेतन की मांग को लेकर श्रमिक संगठन 23 सितंबर को देशव्यापी प्रदर्शन करेंगे।
द ऑल इंडिया ट्रेड यूूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर ने अमर उजाला को बताया कि पूरे उद्योग क्षेत्र में केवल 35 फीसदी श्रमिक ही पंजीकृत होते हैं। लगभग 65 फीसदी श्रमिक गैर-पंजीकृत होते हैं जिनमें ज्यादातर मजदूर ठेकेदारों के माध्यम से काम पाते हैं। लॉकडाउन घोषित होते ही ठेकेदारों ने मजदूरों को कोई भुगतान नहीं किया।
मजदूर कुछ दिन तक पारिश्रमिक की उम्मीद में शहरों में टिके रहे, लेकिन कंपनी या ठेकेदारों से कोई भुगतान नहीं मिलता देख उन्होंने 28-29 मार्च से अपने घरों की ओर भागना शुरू कर दिया। यह त्रासदी सड़कों पर पैदल चलते मजदूरों और उनके परिवारों के रुप में दुनिया को देखने को मिली।
लॉकडाउन के बाद कंपनियां कामकाज तो शुरू कर रही हैं, लेकिन ज्यादातर कंपनियों में पूरी क्षमता से कामकाज नहीं हो रहा है। ऐसे में आज तक इन मजदूरों को कोई आर्थिक रास्ता नहीं मिल पाया है। केंद्र सरकार ने 29 मार्च को यह आदेश दिया था कि इस दौरान कंपनियां किसी कामगर को नहीं निकालेंगी और उसको पूरा वेतन देंगी।
लेकिन इस आदेश का लाभ चंद पंजीकृत श्रमिकों को ही मिल पाया है। ज्यादातर मामलों में इस आदेश का खुला उल्लंघन हुआ है। लॉकडाउन के नाम पर मजदूरों के काम के घंटे बढ़ा दिए गए और इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त वेतन भी नहीं दिया गया, जबकि इसी दौरान कंपनियां टैक्स लाभ, कर्ज में राहत जैसी अनेक सरकारी योजनाओं का लाभ उठाती रही हैं।
श्रमिक संगठनों की राय है कि बड़े औद्योगिक संगठनों को तो अपने मजदूरों को स्वयं भुगतान करने का निर्देश देना चाहिए, लेकिन लघु और मध्यम स्तर की कंपनियों के मजदूरों का वेतन स्वयं केंद्र सरकार को देना चाहिए। संगठन प्रति मजदूर न्यूनतम 7,500 रुपये की मांग कर रहे हैं।