एनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट ने यूनिसेफ इंडिया के सहयोग से एक सर्वे किया है। इस सर्वे में पॉक्सो एक्ट को लेकर चौंकाने वाले खुलासे किए गए हैं। इस सर्वे में दावा किया गया है कि असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में 2016 से 2020 के बीच पॉक्सो संबंधी 7,064 मामले दर्ज किए गए थे। जिनमें से करीबन 1,715 मामले (24.3 प्रतिशत) मामले 'प्रेम संबंधों' के थे। इस सर्वे में यह भी सामने आया है कि करीब 1609 मामलों यानी करीब 94 फीसदी में आरोपियों को छोड़ दिया गया, वहीं केवल 106 मामलों यानी करीब 6 फीसदी मामलों में आरोपी पर दोष सिद्ध हो पाया।
एनफोल्ड प्रोएक्टिव हेल्थ ट्रस्ट और यूनिसेफ इंडिया के सहयोग असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की विशेष अदालतों द्वारा दिए गए 1715 फैसलों के विश्लेषण में सामने आया है कि इन राज्यों में हर चार में से एक मामला प्रेम संबंध से जुड़ा होता है। ऐसे मामलों में पीड़िता ने आरोपी के साथ अपनी सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित किया होता है। इसके साथ ही इस विश्लेषण में यह खुलासा भी हुआ है कि 'रोमांटिक मामलों' में से आधे मामलों में पीड़िता की उम्र 16 से 18 के बीच होती है।
मई 2021 में स्वागत राहा और श्रुति रामाकृष्णन ने इस सर्वे को शुरू किया था। दोनों ने इसके लिए साल 2016 से 2020 के बीच में असम, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में दर्ज पॉक्सो एक्ट के 7064 फैसलों का विश्लेषण किया। जिनमें से करीबन 1,715 मामले (24.3 प्रतिशत) मामले 'प्रेम संबंधों' के थे। वहीं, 1,508 मामलों (87.9 प्रतिशत) में पीड़िता ने जांच या सबूत इकट्ठे करने के दौरान अभियुक्त के साथ प्रेम संबंध में होने की बात स्वीकार की थी। वहीं, 578 मामलों (33.7 फीसदी) में लड़की के परिवार और 170 मामलों (9.9 फीसदी) में अभियोजन पक्ष ने अदालत में पेश किया कि पीड़िता और आरोपी के बीच प्रेम संबंध थे।
विश्लेषण के मुताबिक, अधिकांश मामलों में 1,058 यानी करीब 61.7 प्रतिशत मामलों में विशेष अदालत ने स्पष्ट रूप से निष्कर्ष निकाला कि अभियुक्त और पीड़िता के बीच संबंधों की प्रकृति सहमति की थी। वहीं, 1715 मामलों में से करीबन 131 मामले (7.6 फीसदी) ऐसे थे जिनमें आरोपी और पीड़िता का रिश्ता प्रेम संबंधों का था, लेकिन लड़की ने आखिर में इससे इनकार कर दिया। इसके अलावा भी इस रिपोर्ट में कई खुलासे किए गए हैं।
गौरतलब है कि हाल ही में भारत के सीजेआई डी वाई चंद्रचूड़ ने पॉक्सो एक्ट के तहत सहमति से संबंध बनाने के लिए उम्र सीमा पर दोबारा विचार करने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि विधायिका को साल 2012 में अमल में आए अधिनियम के तहत तय सहमति की उम्र पर विचार करना चाहिए। इसके साथ ही प्रेम संबंध के मामलों के पॉक्सो एक्ट के दायरे में लाने पर भी उन्होंने चिंता जाहिर की थी।