भारत में मंकीपॉक्स वायरस ने अपने पैर पसार लिए हैं। कई राज्यों में वायरस से संक्रमित मरीज सामने आ रहे हैं। कोरोना की तरह ही संक्रामक रोग होने के कारण इसके फैलने और लक्षणों को लेकर भी कई सवाल लोगों के मन में उठ रहे हैं। इन्हीं में से एक है कि क्या मंकीपॉक्स वायरस का संक्रमण एसिम्टोमैटिक यानि बिना लक्षणों वाला भी हो सकता है। जैसा कि कोरोना वायरस की दोनों लहर के दौरान देखा गया था।
अमर उजाला से चर्चा में सफदरजंग अस्पताल के प्रोफेसर, निदेशक कम्यूनिटी मेडिसिन डॉ. जुगल किशोर कहते है कि मंकीपॉक्स के दौरान तेज बुखार आता है, जो सामान्य रूप से भी लोगों को आ जाता है। थकान, बदन और सिर दर्द, मांसपेशियों में दर्द भी सामान्य बात है। सिर्फ त्वचा पर दिखाई देने वाले लाल चकत्तों या पस भरे हुए लाल दानों के उभरने से ही मंकीपॉक्स का शक पैदा होता है और मरीज इसकी जांच कराता है।
हालांकि यह यह अलग बात है कि मंकीपॉक्स का वायरस शरीर में जाने के बाद लक्षण पैदा करने या अपना असर दिखाने में कुछ समय लगाता है, जो वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड कहलाता है। मंकीपॉक्स के इन्क्यूबेशन पीरियड को लेकर अभी तक कई अनुमान जताए गए हैं। ऐसे में 6 से 13 दिन या 5 से 21 दिन पहले संपर्क में आने के बाद इसका संक्रमण देखा जा सकता है। लिहाजा लक्षण न आ पाने के चलते इस वायरस के संक्रमण को पहचानना तो काफी मुश्किल है, लेकिन एक बात तय कि अगर किसी के अंदर यह वायरस पहुंच चुका है लेकिन लक्षण प्रकट नहीं हुए हैं। ऐसी स्थिति में अगर कोई स्वस्थ व्यक्ति इस संक्रमित के बेहद करीब रहता है तो वह भी प्रभावित हो सकता है।
मंकीपॉक्स वायरस एक मानव चेचक के समान एक दुर्लभ वायरल संक्रमण है। 1958 में यह पहली बार शोध के लिए रखे गए बंदरों में पाया गया था। इस वायरस का पहला मामला 1970 में रिपोर्ट किया गया है। मुख्य रूप से मध्य और पश्चिम अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय वर्षावन क्षेत्रों में यह रोग में होता है। मंकीपॉक्स का कोई इलाज नहीं है। लेकिन चेचक का टीका मंकीपॉक्स को रोकने में 85 फीसदी साबित हुआ है।