फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इसलिए माओवादी जोड़े ने हथियारों से की तौबा, अब सम्मानजनक जिंदगी जीने की है चाह

Mon, 06 Aug 2018 10:06 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मल्कानगिरी
विज्ञापन
विज्ञापन

उड़ीसा के माओवादी प्रभावित जिले मल्कानगिरी में बना एक पुल लोगों की जिंदगी बदल रहा है। 26 जुलाई को इस पुल का उद्घाटन किया गया था। इस पुल का नाम गुरुप्रिया है जिसने एक बार फिर से उन 151 गांवों को जोड़ने का काम किया है जो हाइडल प्रोजेक्ट की वजह से मल्कानगिरी से पिछले 50 सालों से अलग हो गए थे। इस पुल ने एक माओवादी जोड़े को मेनस्ट्रीम में लाने का काम भी किया है। 

विज्ञापन


वागा उरनामी और उनकी 20 साल की पत्नी मुडे माधी ने इस बात को स्वीकार किया कि जनतापी में पुल को बचाने के लिए की गई स्थायी सुरक्षा व्यवस्था की वजह से उन्होंने 29 जुलाई को हथियार छोड़ दिए। उरनामी उर्फ मुकेश और माधी उर्फ मेसी के सिर पर 5 लाख का ईनाम था। 26 साल का उरनामी पुलिस के लिए एक वांछित अपराधी था जो कम से कम 25 अपराधों में संलिप्त था। जिसमें सात हत्या और हत्या के प्रयास मामले शामिल है। वहीं उसकी पत्नी 15 हमलो में साथ देने के लिए जिसमें आठ हत्या के मामले हैं, उनमें शामिल थी। 

अब दोनों माओवादी कैंप से बाहर जीवन जीने की कोशिश कर रहे हैं और उस जंगल के बारे में सोच रहे हैं जो पिछले 10 सालों से उनका घर हुआ करता था। उरनामी ने कहा, 'जंगल में जिंदगी काफी तकलीफदेह थी। मैंने अपनी जिंदगी के 10 मूल्यवान साल गरीबों के लिए काम करने की झूठी धारणा में गंवा दिए।' वह पहले मल्कानगिरी-कोरापुट क्षेत्र की माओवादी समिति का सदस्य हुआ करता था। 
विज्ञापन


साल 2008 में उरनामी इसमें शामिल हुआ था। उन्होंने बताया, 'माओवादी अक्सर हमारे गांव मारीगेट्टा आया करते थे। उनके द्वारा कई बार अपील किए जाने के बाद मैं सीपीआई (माओवादी) में शामिल हो गया।' वह एक किसान परिवार से आते हैं। वह चार भाईयों और दो बहनों में दूसरे नंबर के हैं। पार्टी में शामिल होते समय उनकी उम्र 16 साल थी और वह कालीमेला लोकल गुरिल्ला स्कवॉयड का हिस्सा बने। वह कभी स्कूल नहीं गए थे। वह इस स्कवॉयड में 8 साल तक रहे। उन्होंने बताया कि हमला करने का आदेश ऊपर से आया करता था और हम केवल उसे निष्पादित करते थे।

माधी केवल 15 साल की उम्र में सीपीआई (माओवादी) का हिस्सा बनी थीं। वह गांववालों में उनकी विचारधारा को फैलाया करती थीं। उन्होंने बताया कि 24 अक्टूबर 2016 को हुए रामागुडा एनकाउंटर में हमारे 30 कैडर मारे गए थे। हमारी पूरी संस्था हतोत्साहित हो गई थी। एक स्थिर आय का स्रोत ना होने की वजह से उन्होंने आत्मसमर्पण किया। 

उरनामी ने कहा, 'हमें कभी हमारे काम के लिए कुछ नहीं मिला। हमें मुफ्त में कपड़े और खाना मिलते थे। मुझे गांववालों के साथ बैठक करने के लिए 1 से 2 हजार रुपए मिला करते थे।' माधी ने बताया, 'पार्टी की अब कोई विचारधारा नहीं रही है। इसलिए हमने जंगल की जिंदगी को छोड़ने का निर्णय लिया। हम महीनों से आत्मसमर्पण करने के लिए सही समय का इंतजार कर रहे थे। हमने अपने कॉमरेड्स को बताया कि हम काफी समय से संगठन में रहे हैं और अब कुछ दिनों के लिए गांव जाना चाहते हैं। इस वजह से किसी ने हमारे ऊपर शक नहीं किया।' दोनों अब एक सम्मानित जीवन जीना चाहते हैं।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें