राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत की पहचान यहां की अलग-अलग भाषाओं, धर्मों, जातियों और संस्कृतियों से बनती है। भारत अपने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक प्रगति को साथ लेकर दुनिया को बेहतर बनाने में योगदान दे सकता है। शुक्रवार को मुंबई के प्रभादेवी में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को भारतीय समाज और उसकी परंपराओं की जानकारी देना जरूरी है। दुनिया भर से मिलने वाले ज्ञान का इस्तेमाल भी समाज की भलाई के लिए किया जाना चाहिए।
धर्मों के टकराव से जा रही लोगों की जान: मोहन भागवत
मोहन भागवत ने एक अंतरधार्मिक बैठक का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि वहां एक व्यक्ति ने उनसे कहा था कि धर्मों के बीच टकराव के कारण लोगों की जान जा रही है, लेकिन इस समस्या का समाधान आसानी से नहीं मिल रहा है।
'गीता से लेकर आधुनिक विचारकों तक, मूल संदेश एक'
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भगवद्गीता में मिलने वाला शाश्वत ज्ञान भारत और दुनिया की अलग-अलग परंपराओं में भी दिखाई देता है। समय और परिस्थितियों के हिसाब से इसे समझाने के शब्द और तरीके बदल सकते हैं, लेकिन मूल संदेश एक ही रहता है। उन्होंने कहा कि प्राचीन परंपराओं से लेकर आधुनिक विचारक युवाल नोआ हरारी तक के विचारों में दुनिया को समझने से जुड़े कई समान निष्कर्ष दिखाई देते हैं।
सिर्फ शब्द नहीं, उनके पीछे छिपे संदेश को समझें- भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया, अपने आसपास के माहौल और अपने व्यवहार को समझने के लिए शाश्वत सत्य को जानना जरूरी है। अलग-अलग परंपराएं एक ही मूल सिद्धांत को अलग-अलग शब्दों में समझा सकती हैं। ऐसे में लोगों को केवल शब्दों या बाहरी तौर-तरीकों पर ध्यान देने के बजाय यह समझना चाहिए कि उन शिक्षाओं का असली संदेश क्या है। उनके मुताबिक, संदेश को छोड़कर केवल शब्दों पर ध्यान देने से भ्रम पैदा होता है।
बुद्धि सारथी, आत्मा रथ का मालिक और शरीर घोड़ों जैसा-भागवत
भागवत ने चेतना का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया में एक साझा चेतना की बात की जाती है और इसे हर चीज की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने इंसान के जीवन को रथ के उदाहरण से समझाया। उनके अनुसार, बुद्धि सारथी की तरह, आत्मा रथ के मालिक की तरह और शरीर के अंग रथ के घोड़ों की तरह हैं। उन्होंने कहा कि अहंकार कई बार इंसान को गलत दिशा में ले जाता है, जिससे उसे दुख और निराशा का सामना करना पड़ता है।
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'छोटी-सी निराशा में टूट जाते हैं लोग, मार्गदर्शन जरूरी'
भागवत ने कहा कि आज छोटी-सी निराशा से कुछ लोग हताश हो जाते हैं और कुछ अपनी जान तक दे देते हैं। जीवन में रोजमर्रा की चुनौतियों का सामना करने के लिए भी मार्गदर्शन की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि महान व्यक्तित्वों का जीवन और उनकी रचनाएं समाज को रास्ता दिखाती हैं। इनसे लोग बदलते समय के साथ आगे बढ़ते हुए अपने मूल्यों को बनाए रखना सीख सकते हैं।
भागवत ने कहा कि विदेश जाने वाले नई पीढ़ी के युवाओं को अक्सर बताया जाता है कि उनकी जड़ें भारत, यहां की परंपराओं और ज्ञान से जुड़ी हैं। लोग उनसे भारत की विशेषताओं और उसकी पहचान के बारे में जानना चाहते हैं। उन्होंने गुजरात के जामनगर स्थित एक आधुनिक तेलशोधन कारखाने का उदाहरण भी दिया।
सफलता हो या असफलता, युवाओं को आगे बढ़ना सिखाएं- मोहन भागवत
मोहन भागवत ने कहा कि नई पीढ़ी को आने वाली चुनौतियों का सामना करना सिखाना जरूरी है। युवाओं को सफलता और असफलता, दोनों परिस्थितियों में आगे बढ़ते रहने और अपने जीवन को सार्थक बनाने की सीख दी जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि नई पीढ़ी की मातृभाषा पर कमजोर पकड़ और कम समय तक ध्यान केंद्रित कर पाने की क्षमता को लेकर अक्सर चिंता जताई जाती है।