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कंप्यूटर डाटा निगरानी पर संग्राम, एकजुट विपक्ष का मोदी सरकार पर हमला

Fri, 21 Dec 2018 03:36 PM IST
अमित मंडल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • अबकी बार निजता पर वार। चुनाव हारने के बाद मोदी सरकार अब आपके कंप्यूटर की जासूसी करना चाहती है: सुरजेवाला  
  • अरविंद केजरीवाल, असदुद्दीन ओवैसी, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी ने मोदी सरकार के फैसले पर उठाए सवाल 
  • क्या है मामला?: गृह मंत्रालय ने 10 खुफिया एजेंसियों को कंप्यूटरों के डाटा जांचने का अधिकार दिया है। 
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कंप्यूटर निगरानी पर सियासी संग्राम
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विस्तार
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केंद्र सरकार के खुफिया एजेंसियों को कंप्यूटरों का डाटा जांचने का अधिकार देने के फैसले पर सियासी संग्राम छिड़ गया है। इसे लेकर सभी विपक्षी दलों ने एक साथ मोदी सरकार पर हमला बोल दिया है। विपक्षी नेताओं ने एक सुर में सरकार के इस फैसले की आलोचना करते हुए इसे तानाशाही करार दिया है। कांग्रेस से लेकर वामदलों तक सभी इस फैसले के खिलाफ हो गए हैं। वहीं सरकार ने इस पर सफाई देते हुए कहा कि कोई नया अधिकार नहीं दिया गया है। गृह मंत्रालय ने कहा है कि किसी भी एजेंसी को कोई नया अधिकार नहीं दिया गया है। कंप्यूटर मॉनिटरिंग, इंटरसेप्शन जैसा मामला सक्षम अधिकारी, जैसे गृह सचिव की अनुमति से ही आगे बढ़ेगा।  

कांग्रेस का हमला

राहुल गांधी ने इसे लेकर पीएम मोदी पर तीखा हमला किया। उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा, भारत को पुलिस राज्य में बदलने से आपकी समस्याएं हल नहीं होंगी, इससे केवल यह साबित होता है कि आप ‘असुरक्षित तानाशाह’ हैं।

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कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने कहा कि अगर कोई कंप्यूटरों की निगरानी करेगा तो यह ऑरवेलियन स्थिति (एक ऐसी परिस्थिति जिसे जॉर्ज ऑरवेल ने स्वतंत्र समाजद के लिए विनाशकारक बताया था) होगी। वहीं कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी इसकी तीखी आलोचना की। उन्होंने मोदी सरकार के नारे की ही तर्ज पर ट्वीट किया, 'अबकी बार निजता पर वार। चुनाव हारने के बाद मोदी सरकार अब आपके कंप्यूटर की जासूसी करना चाहती है। यह निंदनीय प्रवृत्ति है।' 
 

 

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ममता-केजरीवाल भी बिगड़े

तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी इसे लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने इसे खतरनाक बताते हुए मुद्दे पर जनता की राय मांगी है। उन्होंने लिखा- मुझे पता चला है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कल एक आदेश जारी कर 10 केंद्रीय एजेंसियों को कंप्यूटर पर किसी भी सृजित, प्रेषित, प्राप्त या भंडारित सूचना को देखने, उनकी निगरानी करने और ‘डिक्रिप्शन’ करने के लिए अधिकृत किया है। अगर यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए है, तब भी उसके लिए केंद्र सरकार के पास पहले से ही तंत्र है। लेकिन सभी आम लोग क्यों प्रभावित हो? लोग अपनी राय दें।


दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने भी इस फैसले पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा- 'मई 2014 से भारत अघोषित इमरजेंसी के दौर से गुजर रहा है। नागरिकों के कंप्यूटर पर निगरानी के फैसले से मोदी सरकार ने सारी हदें पार कर दी हैं। क्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में अधिकारों का ऐसे हनन होगा।'  
 

ओवैसी-येचुरी ने उठाए सवाल

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी भी इस फैसले को लेकर भड़के हुए हैं। उन्होंने मोदी सरकार को निशाने पर लेते हुए जासूसी कराने का आरोप लगाया है। ओवैसी ने आदेश की कॉपी ट्वीट करते हुए कहा- मोदी ने राष्ट्रीय एजेंसियों को हमारे कम्युनिकेशन की जासूसी का आदेश दे दिया है। किसे पता था कि घर घर मोदी नारे का यह मतलब था। जॉर्ज ऑर्गवेल के बड़े भाई यहां हैं और 1984 में आपका स्वागत है। 
वहीं सीपीएम ने भी इस फैसले की कड़ी आलोचना की है। माकपा पोलित ब्यूरो और पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी ने निजी कंप्यूटरों को भी जांच एजेंसियों की निगरानी के दायरे में लाने के सरकार के फैसले की आलोचना करते हुए सवाल किया कि सरकार हर भारतीय को अपराधी क्यों मान रही है? 

येचुरी ने गृह मंत्रालय के 10 केंद्रीय एजेंसियों को सभी कंप्यूटरों पर निगरानी करने संबंधी आदेश को असंवैधानिक बताया है। उन्होंने ट्वीट कर कहा ‘प्रत्येक भारतीय के साथ अपराधी की तरह व्यवहार क्यों किया जा रहा है? यह आदेश असंवैधानिक है। यह सरकार द्वारा पारित किया गया है जो हर भारतीय पर निगरानी रखना चाहती है।’ 

क्या है केंद्र का आदेश 

बता दें कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक आदेश जारी करते हुए 10 खुफिया एजेंसियों को कंप्यूटरों के डाटा जांचने का अधिकार दे दिया है। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69 के तहत अगर एजेंसियों को किसी भी संस्थान या व्यक्ति पर देशविरोधी गतिविधियों में शामिल होने का शक होता है तो वे उनके कंप्यूटरों में मौजूद सामग्रियों को जांच सकती हैं और उन पर कार्रवाई कर सकती हैं।
 
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