प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की नीति को लेकर हो रही किरकिरी से केंद्र सरकार आजिज आ गई है। अपने कार्यकाल के आखिरी दौर में चल रही मोदी सरकार अब किसानों को खुश करने के लिए इज्जत बचाने में जुट गई है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधिकारी डा. आशीष भूटानी एक बार फिर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के जिन्न का चेहरा बदलने में जुटे हैं। पिछले 15 दिन से लगातार उनका विभाग इसमें व्यस्त है और उम्मीद है कि जल्द ही केंद्र सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के चमकदार अंश की घोषणा कर देगी।
13 जनवरी 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के किसानों को प्राकृतिक आपदा आदि के चलते होने वाले नुकसान से बचाने के लिए नई योजना के तौर पर प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की घोषणा की थी। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि इसके आर्किटेक्ट भी डा. आशीष भूटानी और राजीव चौधरी थे। यह फसल बीमा योजना प्रधानमंत्री कार्यालय के अफसरों की मानिटरिंग में तैयार हुई थी।
लेकिन इसके कारण किसानों को नुकसान ज्यादा, फायदा कम हो रहा है। इसको लेकर संसद में भी सवाल उठे हैं और संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी योजना पर अंगुली उठाई गई है। लिहाजा केंद्रीय कृषि मंत्रालय अब इसे तर्क संगत रूप देकर एक बार फिर किसानों का मन मोहने में जुट गया है।
बीमा योजना नहीं पैकेज थी यह
कृषि मंत्रालय के अधिकारी की माने इसे बड़ी चालाकी से तैयार किया गया था। इसे तैयार करने के लिए राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एनएआईएस) और संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना (एमएनएआईएस) के स्थान पर नई नीति लाई गई। इसमें किसानों के लिए सरकार रबी, खरीफ के साथ-साथ बागवानी और वाणिज्यिक फसलों को भी शामिल कर लिया। बताते हैं, फसलों का दायरा बढ़ाकर इसे आकर्षक रूप तो दे दिया गया, लेकिन तकनीकी तरीके से बीमा कंपनियों को लाभ पहुंचाने के प्रावधान भी हो गए।
सूत्र का कहना है कि इनमें उन फसलों को भी शामिल कर लिया गया जो कुछ-कुछ क्षेत्र विशेष में बोई जाती हैं। इन्हें हर किसान नहीं बोता और उनका प्रीमियम भी अधिक है। टाटा स्काई, एयरटेल के टीवी पैकेज की तरह किसान कृषि योजना का एक पैकेज तैयार हो गया।
योजना आकर्षक क्यों थी?
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के आकर्ष का सुंदर पहलू यह था कि इसमें किसान को प्रीमियम का पहले की तुलना में प्रीमियम का काफी कम भुगतान करना पड़ा। इसके लिए 13 जनवरी 2016 को केंद्र सरकार ने तीन साल में 8800 करोड़ रुपये के खर्च का प्रावधान किया था। दूसरा प्रीमियम का एक बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार और राज्य सरकार करेगी।
सरकारी सब्सिडी पर ऊपर की कोई सीमा नहीं रखी गई। इतना ही नहीं, बचा हुआ प्रीमियम का अंश 90 प्रतिशत होने पर भी उसका वहन सरकार द्वारा किया जाएगा। इससे शुरू में किसान भी खुश हो गए, लेकिन नीति की खामी बाद में समझ में आई। मसलन हरियाणा का किसान कपास की बुआई नहीं करता, लेकिन फसलों के प्रीमियम पैकेज में शामिल है तो बीमा कंपनी को इसका प्रीमियम सरकारों और किसान से मिल रहा है।
खामी क्या रही?
किसानों को प्राकृतिक आपदा, दुर्घटना के चलते भुगतान कम मिला और बीमा कंपनियों कई गुणा का फयदा बटोर गई। आरटीआई के जरिए सामने आई जानकारी के मुताबिक अक्टूबर 2018 तक बीमा कंपनियों ने 66 हजार 242 करोड़ रुपये का प्रीमियम पा लिया। इसके सामानांतर 2016-17, 2017-18 में किसानों का कुल दावा 34 हजार 441 करोड़ रुपये का रहा और उन्हें भुगतान में 31 हजार 612 करोड़ रुपये ही मिले।
देश के दर्जन भर से अधिक राज्यों में किसानों को उनके दावे से काफी कम भुगतान हुआ। कृषि मंत्रालय के अफसरों का भी मानना है कि रिलायंस, एचडीएफसी, आईसीआईसीआई लुम्बार्ड, बजाज जैसी बीमा कंपनियों ने नीति का लूपहोल ढूंढकर किसानों को भुगतान में काफी देरी की और गाढ़ी कमाई का जरिया बनाया। क्योंकि जो प्रीमियम के नाम पर कंपनियों के पास पैसा जा रहा है, वह किसान और पब्लिक (सरकार) का है। इस तरह से किसान घाटे में रह गया और बीमा कंपनी बंपर मुनाफे में।
अब क्या कर रही है सरकार
केंद्र सरकार प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की नीति में थोड़ा बदलाव कर रही है। इसे दुरुस्त करके किसानों के लिए हितकारी बनाया जा रहा है। बजट 2018-19 में फसल बीमा योजना के लिए अधिक राशि के आवंटन की योजना है। पिछले बजट में केंद्र सरकार ने 13 हजार करोड़ रुपये इस मद में आवंटित किए थे। 2019-2020 के बजट में इसे 15 हजार या इससे अधिक किया जा सकता है।
केंद्र सरकार चाहती है कि एक बार देश का अन्नदाता महसूस कर ले कि सरकार उसके साथ है। समझा जा रहा है कि फसल बीमा योजना से उन फसलों की संख्या कम की जा सकती है, जिसके संबंधित क्षेत्र के किसान बुआई नहीं करते और उनका प्रीमियम भी अधिक है। ताकि इसका स्वरूप थोड़ा तर्क संगत हो सके।