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Language Row: 'न तब, न अब, आगे भी नहीं देंगे हिंदी को जगह', भाषा शहीद दिवस पर बोले एमके स्टालिन

Sun, 25 Jan 2026 09:43 AM IST
देवेश त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चेन्नई

सार

तमिलनाडु की डीएमके सरकार वर्षों से हिंदी का विरोध कर राज्य की सत्ता में आती रही है। डीएमके केंद्र सरकार की नई शिक्षा नीति (NEP) के जरिए हिंदी को बढ़ावा देने के प्रयासों को 'हिंदी थोपना' बताकर लगातार विरोध करती रही है। पार्टी का स्पष्ट रुख है कि तमिलनाडु में हिंदी को कभी अनिवार्य नहीं होने दिया जाएगा।
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एमके स्टालिन, सीएम, तमिलनाडु - फोटो : ANI
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विस्तार
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तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एमके स्टालिन ने रविवार को भाषा शहीद दिवस के मौके पर राज्य के 'भाषा शहीदों' को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में हिंदी के लिए 'न तब जगह थी, न है और न ही कभी होगी।'
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स्टालिन ने सोशल मीडिया पर साझा किए गए संदेश में कहा कि तमिलनाडु ऐसा राज्य है, जिसने अपनी भाषा को जीवन की तरह प्रेम किया और हिंदी थोपे जाने के खिलाफ हर बार एकजुट होकर उतनी ही तीव्रता से संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि हिंदी थोपने के प्रयासों का राज्य ने हमेशा विरोध किया है।

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हिंदी विरोधी आंदोलन का साझा किया वीडियो
सीएम एमके स्टालिन ने भाषा आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक संक्षिप्त वीडियो भी साझा किया। इस वीडियो में 1965 के दौरान चरम पर पहुंचे हिंदी विरोधी आंदोलन, उसमें शहीद हुए लोगों और डीएमके के दिवंगत नेताओं सीएन अन्नादुराई तथा एम करुणानिधि के योगदान का उल्लेख किया गया है।

स्टालिन ने कहा कि तमिलनाडु ने हिंदी विरोधी आंदोलन का नेतृत्व कर उपमहाद्वीप में विभिन्न भाषाई समुदायों के अधिकार और पहचान की रक्षा की। उन्होंने तमिल भाषा के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले शहीदों को नमन करते हुए कहा कि अब भाषा के नाम पर कोई और जान नहीं जानी चाहिए, लेकिन तमिल के प्रति प्रेम कभी खत्म नहीं होगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि तमिलनाडु हिंदी थोपे जाने का विरोध करता रहेगा।

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डीएमके करती रही है हिंदी भाषा का विरोध
  • तमिलनाडु में 'भाषा शहीद' उन लोगों को कहा जाता है, जिन्होंने 1964-65 के दौरान राज्य में हुए हिंदी विरोधी आंदोलन में मुख्यतः आत्मदाह के जरिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। 
  • तमिलनाडु आज भी तमिल और अंग्रेजी की दो-भाषा नीति का पालन करता है।
  • डीएमके केंद्र की नई शिक्षा नीति 2020 के माध्यम से हिंदी थोपे जाने का आरोप लगाती रही है।

द्रविड़ राजनीति से हिंदी भाषा के विरोध की राजनीति 
तमिलनाडु की डीएमके सरकार का हिंदी भाषा विरोध ऐतिहासिक, वैचारिक और राजनीतिक आधार पर टिका हुआ है। डीएमके की विचारधारा द्रविड़ आंदोलन से निकली है, जिसने हिंदी थोपे जाने को तमिल भाषा, संस्कृति और पहचान के लिए खतरा माना। 1960 के दशक में हुए हिंदी विरोधी आंदोलनों, खासकर 1965 के आंदोलन में कई लोगों ने जान गंवाई, जिन्हें पार्टी 'भाषा शहीद' के रूप में सम्मान देती है।

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