पूर्वोत्तर के इस पर्वतीय राज्य में विधानसभा की 40 सीटों के लिए इस महीने की 28 तारीख को होने वाले चुनावों में भाजपा की राह आसान नहीं है। यहां मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के तौर पर सहयोगी होने के बावजूद पार्टी अबकी अकेले ही मैदान में उतरी है। लेकिन यहां उसे अपनी हिंदुत्ववादी छवि से जूझना पड़ रहा है।
राज्य की 87 फीसदी आबादी ईसाई है। ऐसे में पार्टी पर लगा हिंदुत्ववादी का ठप्पा ही उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा है। हालांकि अबकी चर्चों के तमाम संगठन उसका पहले की तरह विरोध नहीं कर रहे हैं। बावजूद इसके कहीं न कहीं लोगों में उसे लेकर शंकाएं तो हैं ही। इस तथ्य के बावजूद कि वह पूर्वोत्तर के चार राज्यों में सत्ता में है और दो में सरकार में साझीदार है। भाजपा भी इस बात को समझती है।
लेकिन उसके नेताओं का दावा है कि राज्य के लोग अब समझ गए हैं कि भाजपा सबका साथ सबका विकास की नीति पर आगे बढ़ रही है। प्रदेश अध्यक्ष जे.वी.लूना कहते हैं कि पहले राज्य में पार्टी की छवि भले खराब थी। लेकिन अब धीरे-धीरे इसमें सुधार हो रहा है। अब यहां भाजपा अछूत नहीं रही। भाजपा पांच बार यहां चुनाव लड़ने के बावजूद अपना खाता खोलने में नाकाम रही है। लेकिन अबकी पार्टी को इस राज्य से काफी उम्मीदें हैं।
बीते महीने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने यहां पार्टी के चुनाव अभियान की शुरुआत की थी। उन्होंने राजधानी में पार्टी के एक भ्वय दफ्तर का भी उद्घाटन किया है। प्रदेश नेताओं का दावा है कि राष्ट्र की मुख्यधारा में शामिल होने के लिए लोग अबकी यहां भाजपा को ही चुनेंगे।
लूना कहते हैं कि लोग कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के भ्रष्टाचार से आजिज आ चुके हैं। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि भाजपा का यह दावा खोखला ही नजर आता है। यहां अब तक सत्ता कांग्रेस व एमएनएफ के बीच ही पाला बदलती रही है।