भाजपा ने 39 सीटों पर अबकी उम्मीदवार उतार कर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने का प्रयास जरूर किया है। लेकिन उसकी छवि और राज्य का चुनावी इतिहास पार्टी के खिलाफ है। इस ईसाई-बहुल राज्य में भाजपा को अब भी हिंदुत्ववादी पार्टी के नाते संदेह की निगाहों से देखा जाता है। पांच बार चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी अब तक यहां खाता नहीं खोल सकी है।
अगर आंकड़ों की बात करें तो वर्ष 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को यहां 34 सीटें मिली थीं जबकि एमएनएफ को पांच। बाकी एक सीट क्षेत्रीय दल को मिली थी। ब्रू शरणार्थियों के मुद्दे पर बीते सप्ताह मुख्य चुनाव अधिकारी एसबी शशांक के विरोध में विभिन्न संगठनों के आंदोलन ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी थीं। उसके बाद चुनाव आयोग को मजबूरन इसी सप्ताह शशांक की जगह आशीष कुंद्रा को नया मुख्य चुनाव अधिकारी बनाना पड़ा।
दो साल पहले तक त्रिपुरा को छोड़ कर पूर्वोत्तर के बाकी छह राज्यों में राज करने वाली कांग्रेस के पास अब बस यही राज्य बचा है। अगर यहां भी वह हार गई तो आजादी के बाद पहली बार ऐसा होगा जब इलाके के किसी राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं होगी। यही वजह है कि मिजोरम के विधानसभा चुनाव अबकी सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए अग्निपरीक्षा बन गए हैं।
बीते 10 साल से यहां राज कर रही इस पार्टी की साख और वजूद अबकी दांव पर है। हाल में विधानसभा अध्यक्ष हाईफेई समेत पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) का दामन थाम लिया है। लेकिन बावजूद कांग्रेस नेता राज्य में जीत की हैट्रिक लगाने का दावा कर रहे हैं।
मुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ललथनहौला कहते हैं कि कुछ नेताओं के पाला बदलने से पार्टी की जीत की संभावनाओं पर कोई असर नहीं पड़ेगा। उनका दावा है कि अपने कामकाज के बल बूते कांग्रेस लगातार तीसरी बार राज्य में सरकार का गठन करेगी। लगातार दस साल से सत्ता में रहने की वजह से कांग्रेस को अबकी प्रतिष्ठान-विरोधी लहर के अलावा भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से भी जूझना पड़ रहा है।
इन समस्याओं की काट के लिए ही पार्टी ने उम्मीदवारों की सूची से कई निवर्तमान विधायकों का पत्ता साफ करते हुए एक दर्जन से ज्यादा नए चेहरों को जगह दी है। पूर्वोत्तर के छह राज्यों में या तो भाजपा की सरकार है या फिर वह सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है। अब अगर वह मिजोरम में अपनी सहयोगी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) के साथ सत्ता में आ जाती है तो इलाके के सभी सातों राज्यों में उसकी सरकार बन जाएगी। इसके साथ ही कांग्रेसमुक्त पूर्वोत्तर का पार्टी का वादा हकीकत में बदल सकता है।
वैसे, राज्य में अबकी मुख्य मुकाबला कांग्रेस और विपक्षी एमएनएफ के बीच ही है। वर्ष 1987 में मिजोरम को अलग राज्य का दर्जा मिलने के बाद से यहां होने वाले छह विधानसभा चुनावों में कांग्रेस व एमएनएफ के बीच सत्ता बदलती रही है। वर्ष 1987 में पहला चुनाव एमएनएफ ने जीता था। लेकिन उसके बाद 1989 और 1993 के चुनाव में कांग्रेस विजयी रही थी।
एक दशक के कांग्रेसी शासन के बाद प्रतिष्ठानविरोधी लहर पर सवार होकर एमएनएफ ने 1998 के चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था। उसके बाद वह दस साल तक सत्ता में रही थी। अब कांग्रेस ने भी सत्ता में 10 साल पूरे कर लिए हैं। भाजपा की ओर से पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय दलों को लेकर गठित नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (नेडा) में शामिल होने के बावजूद एमएनएफ ने अकेले मैदान में उतरने का फैसला किया है।
एमएनएफ अध्यक्ष जोरमथांगा कहते हैं कि हम पहले भी अपने बूते जीत चुके हैं और इस बार लोग भी कांग्रेस की भ्रष्ट सरकार को सबक सिखाएंगे। पांच बार चुनाव लड़ने के बावजूद इस ईसाई-बहुल राज्य में अब तक भाजपा का खाता नहीं खुल सका है। इस बार भी वह अपने बूते यहां कुछ खास करने की स्थिति में नहीं है।