उन्होंने कहा कि 30 साल पहले मिजोरम में कांग्रेसी गतिविधियां शुरू होने के समय उसे भी बाहरी कहा गया था। राज्य में उग्रवाद के चरम पर रहने के दौरान भूमिगत संगठन ने उनके उम्मीदवारों को नामांकन पत्र तक दाखिल नहीं करने दिया था। लेकिन इसके बावजूद कांग्रेस ने कई बार यहां सरकार बनाई है और लोग उसे स्वीकार करने लगे। लूना कहते हैं कि भाजपा की स्वीकार्यता भी तेजी से बढ़ रही है। पार्टी ने दो पादरियों को भी टिकट दिया है।
लेकिन यहां तो अबकी पहले की तरह मुख्य मुकाबला कांग्रेस व एमएनएफ में ही माना जा रहा है। ऐसे में भाजपा का खाता खुलने की कितनी संभावना है? लूना बताते हैं कि वर्ष 2013 में पार्टी ने आठ उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। तब पार्टी को तीन फीसदी वोट मिले थे। अबकी हमने 39 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।
उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरी से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति समय पर नहीं मिलने की वजह से एक उम्मीदवार नामांकन पत्र दाखिल नहीं कर सका। अबकी हम यहां कम से कम 25 सीटें जीतेंगे। वह कहते हैं कि यहां भी त्रिपुरा का नतीजा दोहराया जाएगा। लेकिन भाजपा व एमएएफ में गोपनीय साठ-गांठ के आरोप भी लग रहे हैं। लूना का कहना है कि यह दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं।