लक्षण नजर आने पर कई तरह से कोरोना का टेस्ट किया जा सकता है। इसमें आरटीपीसीआर और एंटीजन टेस्ट सबसे ज्यादा चर्चित हैं। आरटीपीसीआर टेस्ट को सबसे सटीक माना जाता है। इसके लिए संबंधित मरीज की नाक या गले या फिर दोनों से स्वैब लेकर लेबोरेट्री भेजा जाता है। लैब में वायरस के आरएनए या जेनेटिक कंपोनेट की जांच होती है। जेनेटिक कंपोनेट होने या नहीं होने से पता चलता है कि संबंधित व्यक्ति पॉजिटिव है या निगेटिव है। स्वैब लेने से लेकर रिपोर्ट आने तक की पूरी प्रक्रिया में 24 से 48 घंटे लग जाते हैं।
वहीं, अगर रैपिड एंटीजन टेस्ट की बात करें तो इस टेस्ट का नतीजा आने में केवल 10 से 20 मिनट का समय लगता है। इसके लिए नाक से स्वैब लिया जाता है। वायरस में पाए जाने वाले एंटीजन का पता चलता है। इस टेस्ट में उस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाता है जिसमें वायरस स्ट्रेन में केवल प्रोटीन का पता लगाता है।
कोरोना के लक्षण होने और एंटीजन रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद भी आरटीपीसीआर रिपोर्ट निगेटिव क्यों आ जाती है?
मुंबई के ग्लोबल हॉस्पिटल में सीनियर कंसल्टेंट- पल्मोनोलॉजी एंड क्रिटिकल केयर, डॉक्टर हरीश चाफले बताते हैं कि आरटीपीसीआर टेस्ट का एफिकेसी रेट 70% है। यानी, 100 में से 30 मामले ऐसे भी होते हैं जो पॉजिटिव होने के बाद आरटीपीसीआर टेस्ट में निगेटिव आते हैं। भले ही मरीज में बुखार, गले में खराश, थकान, शरीर में दर्द, खांसी जैसे कोरोना के लक्षण हैं। ऐसे मामलों को फॉल्स निगेटिव कहते हैं।
कई एक्सपर्ट इसका कारण कम वायरल लोड को भी बताते हैं। किसी संक्रमित के संपर्क में आने के दो से 14 दिन के भीतर मरीज में कोरोना के लक्षण दिखाई देते हैं। ऐसे में अगर मरीज अगर जल्दी टेस्ट करा लेता है तो फॉल्स निगेटिव रिपोर्ट आने के आसार ज्यादा होते हैं। अगर मरीज का स्वैब ठीक से नहीं लिया गया तब भी रिपोर्ट फॉल्स निगेटिव या फॉल्स पॉजिटिव हो सकती है।
डॉक्टर हरीश कहते हैं कि अगर किसी मरीज की एंटीजन रिपोर्ट पॉजिटिव आती है तो उसका आरटीपीसीआर टेस्ट करने की जरूरत नहीं होती। क्योंकि, अगर एंटीजन रिपोर्ट पॉजिटिव है तो वो मरीज पॉजिटिव होगा।
मार्श की एक आरटीपीसीआर निगेटिव और दूसरी में पॉजिटिव कैसे आई?
डॉक्टर हरीश कहते हैं पहली बार जब टेस्ट हुआ तो उनकी रिपोर्ट उस 30 फीसदी वाले ब्रैकेट में आई जिसमें मरीज की फॉल्स निगेटिव आती है। दूसरे टेस्ट में मार्श की रिपोर्ट उस 70 फीसदी वाले ब्रैकेट में आई जिसमें मरीज की ट्रू पॉजिटिव रिपोर्ट आती है। यानी, आरटीपीसीआर टेस्ट की 70 फीसीद एफिकेसी के चलते ऐसा हुआ।