केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने कला, संस्कृति और संगीत की 27 हस्तियों को हर हाल में घर खाली करने का निर्देश दिया। जिससे इन कलाकारों में जबरदस्त गुस्सा है। इनका कहना है कि एक तरफ कोरोना की मार और लगातार बिगड़ते हालात, तो दूसरी तरफ देश के तमाम जाने-माने कलाकारों को 31 दिसंबर तक सरकारी घर खाली करने का अल्टीमेटम देना ये कहां का न्याय है। कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज इस आदेश से बेहद खफा हैं और अपने सारे अवार्ड वापस करने की धमकी दे रहे हैं, तो करीब तीन दशकों से भाजपा की तमाम सांस्कृतिक प्रकोष्ठों के लिए काम करने वाली जानी-मानी कथक नृत्यांगनाएं नलिनी और कमलिनी इसे सरकार का कलाकार और संस्कृति विरोधी रवैया करार दे रही हैं।
इन कलाकारों ने अब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चिट्ठी लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है और कहा है कि ‘हम सभी कलाकार 65 से 80 साल की उम्र सीमा के वरिष्ठ नागरिक हैं और अभी भी अपने- अपने क्षेत्र में सक्रिय हैं। सभी कलाकारों को अपने अपने क्षेत्र में पद्मश्री, पद्मभूषण और संगीत नाटक अकादमी जैसे सम्मान मिल चुके हैं और हमसभी पिछले चार-पांच दशकों से कला, संगीत औऱ अन्य विधाओं के जरिये देश की सेवा कर रहे हैं।
कोरोना के इस खतरनाक वक्त में सरकार हमें घर खाली करने को कह रही है और हम कलाकारों को सड़क पर आने को मजबूर किया जा रहा है, जबकि हम लगातार अपने सरकारी घर का किराया भी दे रहे हैं।‘ कलाकारों ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह इस मामले में हस्तक्षेप करें और कलाकारों को इन्हीं घरों में रहने के लिए एक्सटेंशन दिलवाने का कष्ट करें।
सरकार ने जिन कलाकारों को नोटिस भेजा है उनमें पंडित बिरजू महाराज, चित्रकार जतिन दास, कथक नृत्यांगनाएं नलिनी-कमलिनी, पद्मश्री उस्ताद वसीफुद्दीन डागर, पद्मश्री गुरु भारती शिवाजी, रंगकर्मी मोहन महर्षि, रीता गांगुली, कमाल साबरी, संतूर कलाकार भजन सारपोरी, केआर सुबन्ना, भरतनाट्यम गुरु कनक श्रीनिवासन, गुरु माधर राउत, कला इतिहासकार और समीक्षक सुनील कोठारी समेत 27 कलाकार हैं।
इनमें से ज्यादातर दशकों से दिल्ली के एशियाड विलेज (खेल गांव) में रह रहे हैं। पंडित बिरजू महाराज करीब 45-50 साल से शाहजहां रोड के शानदार सरकारी फ्लैट में रहते हैं। खाली करने का नोटिस मिलते ही बिफर पड़े और कहा कि कलाकारों का यह अपमान उन्हें बर्दाश्त नहीं। विरोध में उन्होंने अपने सारे अवार्ड वापस करने की बात कह दी। जतिन दास कहने लगे कि वो अपनी पेंटिंग से जो कमाते हैं, अपनी कला के अगले प्रोजेक्ट में लगा देते हैं, इतना पैसा ही नहीं बचता कि अपना घर बनवा सकें। 80 साल के जतिन दास को सरकार का ये फरमान तुगलकी लगता है और कहते हैं कि इस उम्र में अब उन्हें फुटपाथ पर धकेला जा रहा है। वो कहते हैं कि मैं कोई व्यावसायिक कलाकार नहीं हूं और न ही कला का व्यापार करता हूं।
वहीं सुनील कोठारी 88 साल के हैं और उन्हें भी पद्मश्री से लेकर संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिल चुका है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य पर उन्होंने बेहतरीन काम किया है, कई पुस्तकें लिखी हैं, तमाम सरकारी समितियों के सदस्य हैं, लेकिन वो इससे आहत हैं कि सरकार उन्हें कोरोना काल और बुढ़ापे में घर से निकाल रही है।
ज्यादातर कलाकारों की यही पीड़ा है। इनकी नजर में सरकार का यह कदम कलाकार और संस्कृति विरोधी है। पंडित बिरजू महाराज की अवार्ड वापसी की धमकी ने एक हलचल जरूर मचाई। दरअसल सरकार की इस नई फेहरिस्त में संघ परिवार और भाजपा के करीब रहने वाले बहुत से कलाकार भी शामिल हैं। उन्हें ऐसा लगा कि कि अगर पंडित जी ने सचमुच अपने सम्मान वापस करने की एक शुरुआत भी कर दी तो कहीं कलाकारों में भी ‘अवार्ड वापसी गैंग’ न तैयार हो जाए। इसलिए इनमें से तमाम कलाकार अचानक सक्रिय हुए और संघ से जुड़े सांस्कृतिक संगठन संस्कार भारती से मामले में हस्तक्षेप करवाया।
संस्कार भारती के राष्ट्रीय महामंत्री अमीर चंद अपने चार प्रतिनिधियों के साथ संस्कृति मंत्री प्रहलाद पटेल से मिलकर कलाकारों के लिए आवास नीति का प्रस्ताव दे आए। उन्होंने ये भी निवेदन किया कि कलाकारों को कोरोना काल में सरकारी आवास खाली करने को मजबूर न किया जाए। कुछ अखबारों में फोटो समेत खबरें भी छपीं और इससे इतनी संभावना तो बन ही गई कि इन सम्मानित कलाकारों को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और संस्कृति मंत्री की तरफ से कुछ दिनों की मोहलत जरूर मिल जाएगी। आखिर सरकार हमेशा से कलाकारों की बेहतरी और उनके लिए बहुत कुछ करने की बातें तो करती ही रही है।
सरकारी आवास पर कब्जे और लंबे समय तक खाली न करने की कहानियां कोई नई नहीं हैं। लेकिन आम तौर पर पूर्व सांसदों और पूर्व मंत्रियों के संदर्भ में ऐसी खबरें बनती आई हैं। मंत्रालय ऐसी सूचियां जारी करता रहता है। किस पर कितना बकाया, किसने सरकारी बंगले में तोड़फोड़ की, किसने कितने समय से किराया नहीं दिया और किसने सरकारी बंगले को किराये पर उठा दिया। करोड़ों रुपए के बकाये और नोटिसों का खेल लंबे समय से चलता रहा है, सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, ये सिलसिला अबतक जारी है।
भाजपा और संघ परिवार के नेता अकसर ये सवाल उठाया भी करते थे कि सरकारी आवासों पर किस तरह कब्जा है और अगर इन्हें खाली नहीं कराया जाएगा तो किसी और को ये सुविधा कैसे मिलेगी। मोदी सरकार को ये गवारा नहीं था और उसने आते ही इस बारे में सख्ती की और नियम कानून लागू करने शुरु कर दिए। अब इसमें कितनी पारदर्शिता है, ये अलग जांच का विषय है।
कलाकारों का कहना है कि उनके साथ वैसे राजनीतिज्ञों जैसा सलूक तो नहीं किया जा सकता जो भ्रष्टाचार में लिप्त रहे हैं, जो सरकारी बंगले पर कब्जा करते हैं और लाखों रुपयों का घोटाला करते हैं। हम तो बाकायदा किराया देते हैं, नियम मानते हैं और अपने हुनर और देश की संस्कृति के प्रति अपने समर्पण की बदौलत थोड़ी सी बड़ी मुश्किल से दिल्ली में रहने का एक सरकारी ठिकाना पाते हैं, उसे भी हमसे छीना जा रहा है।
जाहिर है अपने देश में कलाकारों का, संस्कृतिकर्मियों, साहित्यकारों, लेखकों का जो हाल है वो किसी से छुपा नहीं है। अपने देश की संस्कृति को जीवित रखने वाले, इसे आने वाली पीढ़ी तक ले जाने वाले और दुनिया भर में इसके जरिये देश को सम्मान दिलाने वाले कलाकारों को लेकर सरकारें हमेशा से उदासीन रही हैं। उन्हें उपेक्षा का शिकार होना पड़ता है और कला-संस्कृति के नाम पर सही अर्थों में काम करने वालों के लिए सरकारी मदद न मिल पाना और फंड का बिचौलियों और नौकरशाहों द्वारा हड़प लेना कोई नई बात नहीं है।
कोरोना के नाम पर जिस तरह अपने देश में लूट का साम्राज्य और अमानवीयता की हद दिख रही है, जिस तरह बीमारों से लाखों रुपए लूटकर भी इलाज के नाम पर उन्हें एक रहस्यमयी गुफा में धकेल दिया जा रहा है और जिस तरह मौत को और इंसानों को एक मजाक बना दिया गया है, इससे साफ है कि कलाकारों की दशा-दुर्दशा सरकार के एजेंडे में है ही नहीं।