केंद्र सरकार ने कोरोना वायरस महामारी के उपचार प्रोटोकॉल में एक बार फिर बदलाव किया है। इसके तहत कोरोना संक्रमण के गंभीर मरीजों के इलाज के लिए स्टेरॉयड डेक्सामेथासोन के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है। अब तक के अध्ययनों के अनुसार, इस दवा को देने से कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों को मौत से बचाया जा सका है।
हाल ही में यूरोप के विशेषज्ञों ने एक अध्ययन में इसे साबित भी किया है जिसके बाद विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कोरोना प्रभावित देशों से केवल गंभीर मरीजों के इलाज में इस दवा का इस्तेमाल किए जाने की सलाह भी दी थी।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने शनिवार को उपचार प्रोटोकॉल में संशोधन की जानकारी देते हुए बताया कि ऑक्सीजन सपोर्ट वाले मध्यम और गंभीर स्थिति वाले कोरोना वायरस मरीजों को अभी तक मेथिलप्रेडनिसोलोन नामक दवा दी जा रही थी लेकिन अब इसकी जगह पर डेक्सामेथासोन दवा दी जा सकती है।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि भारत में यह दवा आसानी से उपलब्ध है। साथ ही कई वर्षों से यह दवा राष्ट्रीय दवा आवश्यक सूची (एनएलईएम) में भी शामिल है। सभी राज्य व केंद्र शासित राज्यों को संशोधन से जुड़े दिशा-निर्देश देते हुए जल्द से जल्द अस्पतालों में इन दवाओं को उपलब्ध कराने को कहा गया है।
अभी तक स्वास्थ्य मंत्रालय कोविड उपचार प्रोटोकॉल को लेकर चार बार संशोधन कर चुका है। बीते 13 जून को मंत्रालय ने तीसरा संशोधन करते हुए रेमडेसिविर दवा को आपातकालीन स्थिति में ही इस्तेमाल किए जाने की अनुमति दी थी।
स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ निदेशक ने बताया कि अभी डेक्सामेथासोन दवा पर दुनिया भर में और भी परीक्षण चल रहे हैं जिनमें से कुछ के परिणाम जल्द सामने आ सकते हैं। यूरोप में इस दवा का इस्तेमाल कोविड मरीजों के उपचार में किया जा रहा है।
क्या है डेक्सामेथासोन
डेक्सामेथासोन दवा डब्ल्यूएचओ की आवश्यक दवाओं की सूची में वर्ष 1977 से सूचीबद्ध है। डेक्सामेथासोन एक स्टेरॉयड है जिसका उपयोग सांस की समस्या, एलर्जिक रिएक्शन, ऑर्थराइटिस, हार्मोन या इम्यूनिटी सिस्टम डिसऑर्डर और सूजन के इलाज के लिए किया जाता है। यह दवा शरीर का नेचुरल डिफेंसिव रिस्पॉन्स को भी कम करती है।
वैज्ञानिकों ने कहा कि इस दवा को 2104 मरीजों को दिया गया और उनकी तुलना साधारण तरीकों से इलाज किए जा रहे 4321 दूसरे मरीजों से की गई। दवा के इस्तेमाल के बाद वेंटिलेटर के साथ उपचार करा रहे मरीजों की मृत्यु दर 35 फीसदी तक घट गई। वहीं, जिन मरीजों को आक्सीजन दिया जा रहा था उनमें भी मृत्यु दर 20 प्रतिशत कम हो गई।