देश की संस्कृति और कला से जुड़ी अकादमियों और केंद्रों को लेकर एक अहम सवाल लगातार उठते रहे हैं कि कला के लिए समर्पित तीन अलग-अलग ऐसे केंद्रों की जरूरत भला क्यों है। ललित कला अकादमी (एलकेए), इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) और नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (एनजीएमए) तीन ऐसे केंद्र दिल्ली और देश के कई हिस्सों में काम करते हैं जिनका मकसद कमोबेश एक ही है। इन केंद्रों में ललित कलाओं, मूर्तिशिल्प, स्थापत्य कला से लेकर तमाम लोक कलाओं को प्रोत्साहित करने, उनके संरक्षण और उनसे जुड़े कलाकारों को आगे बढ़ाने वाले कार्यक्रम करने, प्रदर्शनियां लगाने, कार्यशालाएं करने, प्रशिक्षण देने के साथ साथ पुराने और बेहतरीन कला शिल्पियों के कामों को सहेजने और समय समय पर उन्हें प्रदर्षित करने की भी जिम्मेदारी इन केंद्रों पर है। ऐसे में पिछले कुछ सालों से इन तीनों ही केंद्रों के आला अधिकारी परोक्ष रूप से एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं कि उनका काम तो हम ही कर रहे हैं, फिर भला उनकी जरूरत ही क्यों है। इन तीनों ही केंद्रों को एक साथ मिलाकर पुनर्स्थापित करने की जरूरत है।
एनजीएमए ने बदली विरासत
एनजीएमए का कामकाज महानिदेशक अद्वैत गणनायक संभालते हैं। जब मोदी सरकार ने उन्हें ये काम सौंपा तो गणनायक ने इस विरासत को अपने तरीके से बदला, इसमें कला से जुड़े कई कार्यक्रम और कार्यशालाएं आयोजित कीं और पूरे परिसर को सिर्फ एक गैलरी से अलग हटाकर जीवंत कार्यक्रम कराए, सेमिनार हुए और देश के अलग-अलग हिस्से से कलाकारों को बुलाकर उनके काम को प्रदर्शित कराया। अभी यह सिलसिला जारी है। अब तो ये केंद्र पीएम को मिले उपहारों की नीलामी के केंद्र के रूप में ज्यादा जाना जाता है।
...तो उसकी क्या जरूरत
ललित कला अकादमी को लगने लगा कि जो काम वो करता रहा है, भला इसे एनजीएमए को करने की क्या जरूरत है, इसे तो एक कला संग्रहालय के तौर पर बनाया गया है जिसमें तमाम कलाकारों के काम संरक्षित और प्रदर्शित किए जाएं। अगर ललित कला अकादमी के काम एनजीएम करने लगेगा तो उसकी क्या जरूरत है।
आईजीएनसीए में काम का दायरा बड़ा
आईजीएनसीए के बड़े अधिकारी भी मानते हैं कि तीनों कमोबेश एक ही तरह के काम कर रहे हैं। हालांकि आईजीएनसीए के कामकाज का दायरा दोनों से बड़ा है। यहां कलाओं के अलावा, संगीत, नृत्य और इतिहास व परंपरा जैसे संस्कृति के विविध आयामों को समेटा जाता है। वरिष्ठ लेखक, पत्रकार और चिंतक राम बहादुर राय की अध्यक्षता और डॉ सच्चिदानंद जोशी के सदस्य सचिव रहते हुए यहां कई नए काम हुए और यह केन्द्र बेहद सक्रिय हो गया। जाहिर है इतने बड़े केन्द्र में संस्कृति और कला का कोई भी आयाम छूटा नहीं है।
पुनर्विनियोजन कर देना चाहिए : डॉ जोशी भी मानते हैं कि इन संस्थाओं और केंद्रों का पुनर्विनियोजन (रीएप्रोप्रिएशन) कर दिया जाना चाहिए। इससे संयुक्त रूप से और बेहतर काम हो सकेगा। उन्हें लगता है कि संस्कृति मंत्रालय इस दिशा में शायद सोच भी रहा है क्योंकि इस बारे में 2013 में भी एक प्रस्ताव आया था और अगर पीएम इस बारे में एक बार भी तय कर लेंगे तो ये काम हो जाएगा।
एलकेए में कम हो रहा बजट
कुछ समय पहले तक ललित कला अकादमी के अध्यक्ष रहे जाने माने कलाकार उत्तम पचारणे अपनी इसी साफगोई की वजह से कई बार मंत्रालय को खटकते भी थे। पचारणे ने कई बार बातचीत में संवाददाता को बताया भी था कि मंत्रालय कला और कलाकारों की बात तो बहुत करती है लेकिन बजट लगातार कम कर रही है। पचारणे यह भी मानते रहे हैं कि तीन इतनी बड़ी संस्थाओं की भला क्या जरूरत है जब ललित कला अकादमी कलाकारों के लिए हर तरह का काम कर ही रही है। पचारणे से पहले यहां के कार्यकारी अध्यक्ष रहे कलाकार कृष्णा सेट्टी का भी नजरिया कमोबेश यही था। अध्यक्ष रहे उत्तम पचारणे अपनी साफगोई की वजह से कई बार मंत्रालय को खटकते भी थे।
- सेट्टी ने अकादमी को नौकरशाहों से मुक्त कराने और लगातार कला के लिए काम करने और कई बड़े आयोजन करने का काम किया। लेकिन उन्हें भी यहां ज्यादा वक्त तक टिकने नहीं दिया गया।
- अब हालत ये है कि फिलहाल पचारणे के बाद अकादमी के अध्यक्ष का पद खाली है। यहां के कामकाज को देखने का अतिरिक्त प्रभार संगीत नाटक अकादमी की सचिव उमा नंदूरी के पास है।