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कश्मीर के मर्ज का नहीं चला पता : रियासतों का ताना-बाना और सत्ता साझा करने से जुड़े समझौतों की नियति

Sun, 06 Nov 2022 06:46 AM IST
योगेश साहू प्रो. हरिओम, जम्मू/नई दिल्ली।

सार

नई दिल्ली की सत्ताओं और सरकारी थिंक टैंकों, नीति-नियोजकों व संकटमोचकों ने शायद ही पता लगाने की कोशिश की हो कि कश्मीर की क्या समस्या है। वे कश्मीर में उसी पुराने रास्ते पर चल रहे हैं, जिसने लोकतंत्र विरोधी ताकतों को बढ़ावा दिया।
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kashmir - फोटो : istock
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विस्तार
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सांविधानिक प्रावधानों के मुताबिक 1947 में तरह-तरह की 550 रियासतें भारत में शामिल हुईं। जम्मू-कश्मीर भी एक ऐसा ही राज्य था। लगभग सभी रियासतों के भारत में एकीकरण की प्रक्रिया तेज और तकरीबन सुचारु थी। जहां तक जम्मू-कश्मीर का सवाल है, अफसोस की बात है कि यह बेहद दर्दनाक और बहुत धीमी थी। यहां यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। इसकी खास वजह यह है कि जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक ताकतों को बढ़ावा देने के बजाय दिल्ली ने कश्मीर की सत्ता उन लोगों को सौंप दी, जिनकी भारत के बारे में धारणा बिल्कुल अलग थी। जो असल में कश्मीर के लोगों और बाकी देशवासियों के बीच की खाई को चौड़ा करने के लिए काम कर रहे थे। दिल्ली ने जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक ताकतों को दरकिनार कर दिया। दरअसल दिल्ली ने कश्मीर के बहुसंख्यक समुदाय को एक अलग वर्ग माना। जम्मू-कश्मीर को अन्य रियासतों की ही तरह भारत का अभिन्न अंग नहीं माना। 

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समय की मांग, राष्ट्र की जरूरत, कश्मीरी नेतृत्व की प्रकृति व विचारधारा और देश के भू-राजनीतिक हितों के लिए संवेदनशील इस सीमावर्ती राज्य के लिए बहुत सावधानी से काम करने की जरूरत है। लेकिन दिल्ली के शासक वर्ग ने चीजों को और बिगाड़ दिया। अक्तूबर 1949 में दिल्ली ने अनुच्छेद 306ए (अनुच्छेद 370) के माध्यम से जम्मू-कश्मीर को राष्ट्रीय मुख्यधारा से दूर कर दिया। मई 1954 में इसने संसद को दरकिनार कर जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 35ए लागू कर दिया, जिसने भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित सभी गैर-कश्मीरियों को जम्मू-कश्मीर में अवांछित घोषित कर दिया। बीच 1952 में प्रधानमंत्री नेहरू ने जम्मू-कश्मीर के वजीर-ए-आज़म शेख अब्दुल्ला के साथ भारत और इस राज्य की राजनीतिक स्थिति पर बातचीत की। 1952 में शेख ने खुले तौर पर देश को चुनौती दी थी। उसने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए थे कि वह ‘स्विट्जरलैंड-की तरह’ से कम कुछ भी स्वीकार नहीं करेगा।

कश्मीर और कश्मीरी नेताओं के प्रति दिल्ली की मुलायम नीति, पेंडरल मून के शब्दों में, कश्मीर में ‘तीव्र भूख और व्यक्तिगत आशाओं को उत्तेजित करने’ के लिए बाध्य थी। ‘ये, एक बार उत्तेजित होने के बाद आसानी से शांत नहीं होते हैं।’ कश्मीर में ठीक यही हुआ। प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1965 में जम्मू-कश्मीर को सर्वोच्च न्यायालय, चुनाव आयोग और नियंत्रक व महालेखा परीक्षक के दायरे में लाकर और शेख अब्दुल्ला की नेशनल कॉन्फ्रेंस को संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने वाले अधिक स्वायत्तता के नायक, अप्रभावी और खयाली के रूप में प्रस्तुत करके कश्मीर में अलगाव की प्रक्रिया को रोकने की कोशिश की। दुर्भाग्य से उनकी उत्तराधिकारी इंदिरा गांधी ने फरवरी 1975 में इस प्रक्रिया को उलट दिया और फरवरी 1975 में अपना महत्व खो चुके शेख को सत्ता में वापस ले आईं, जिसे उनके पिता नेहरू ने वजीर-ए-आजम के रूप में बर्खास्त कर दिया था और 9 अगस्त, 1953 को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था।
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1974 के बाद हर गुजरते दिन के साथ कश्मीर में चीजें नियंत्रण से बाहर होने लगीं। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में सत्ताधारी दल (कांग्रेस और भाजपा) ने कश्मीरी नेताओं के साथ समझौता नहीं किया। शेख अब्दुल्ला से 1975 का समझौता; जीएम शाह से 1984 का समझौता; 1986 में फारूक अब्दुल्ला से समझौता; मुफ्ती सईद से 2002 का समझौता; 2009 में फारूक और उमर अब्दुल्ला से समझौता; 2015 में भाजपा व मुफ्ती सईद में समझौता; और 2016 में भाजपा और महबूबा मुफ्ती के बीच समझौता इसकी मिसाल हैं। लेकिन कांग्रेस और भाजपा के जोरदार दावों के बावजूद कि ये समझौते ‘राष्ट्रीय हित’ में किए गए थे, ये सभी सत्ता-साझा करने से जुड़े समझौते थे। वास्तव में इन सभी समझौतों ने कश्मीर और नई दिल्ली के बीच की खाई को और चौड़ा किया।

सच्चाई है कि जम्मू-कश्मीर को देश की आबादी का केवल 1 फीसदी होने के बावजूद 2000-2016 में केंद्रीय अनुदानों का 10% प्राप्त हुआ। वहीं, 13% आबादी वाले यूपी को केंद्रीय अनुदान का महज 8.2% प्राप्त हुआ। यानी जम्मू-कश्मीर में प्रति व्यक्ति 91,300 रुपये मिले, जबकि यूपी को प्रति व्यक्ति 4,300 रुपये मिले। क्या इससे कश्मीर या कश्मीरी नेतृत्व का दिल जीत सके। असल में ऐसा नहीं हुआ। जून 2018 से ही केंद्र सरकार ने देश के सर्वोपरि संप्रभु हितों की रक्षा और बढ़ावा देने के लिए जम्मू-कश्मीर में अपने अधिकार का दावा करना शुरू कर दिया था। महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार गिरा दी गई। 

लगभग सभी शीर्ष क्रम के अलगाववादियों और आतंकवादियों को सलाखों के पीछे डाल दिया गया। जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। हुर्रियत कांफ्रेंस ने घुटने टेक दिए। अनुच्छेद 370 को हटा दिया गया और अनुच्छेद 35ए को समाप्त कर दिया गया। लद्दाख को जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। जम्मू-कश्मीर को ही संघ शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। कश्मीर में एक साल तक शांति रही लेकिन अगस्त 2020 के बाद हालात बिगड़ने लगे, जब पूर्व मुख्यमंत्रियों सहित कश्मीर में सांप्रदायिक अशांति और अलगाववादी राजनीति के लिए जिम्मेदार लोगों को रिहा कर दिया गया। 

नई दिल्ली की सत्ताओं और सरकारी थिंक टैंकों, नीति-नियोजकों और संकटमोचकों ने शायद ही यह पता लगाने की कोशिश की हो कि कश्मीर की क्या समस्या है या जानबूझकर कठोर वास्तविकताओं की अनदेखी की है। वे कश्मीर में उसी पुराने रास्ते पर चल रहे हैं जिसने लोकतंत्र विरोधी ताकतों को बढ़ावा दिया। वे कश्मीर की समस्याओं के लिए केवल पाकिस्तान को दोष देना जारी रखे हुए हैं। उन्हें इस क्षेत्र में मौजूद जमीनी हकीकत के आधार पर अपनी पूरी नीति की समीक्षा करनी होगी। वहीं, एक निश्चित नीति बनानी होगी, जो कश्मीरी हिंदुओं को कश्मीर लौटने के लिए प्रेरित करे और वे शांतिपूर्ण, सुरक्षित और समृद्ध जीवन जी सकें। (लेखक सामाजिक विज्ञान संकाय, जम्मू विश्वविद्यालय के पूर्व डीन हैं।)

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