Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए वकील मनोज के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द कर दिया कि पेशेवर काम के दौरान वकील की मौजूदगी को धमकी नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सबूत और स्पष्ट इरादे के केवल अस्पष्ट आरोप आईपीसी की धारा 506 के तहत अपराध नहीं बनाते। क्या है मामला, पढ़ें रिपोर्ट-
सुप्रीम कोर्ट ने एक वकील के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को शुक्रवार को रद्द कर दिया। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि वकील के सलाह देने जैसे पेशेवर काम को डराना या धमकाना नहीं कहा जा सकता।
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शीर्ष कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने कहा कि बिना ठोस सबूत के अस्पष्ट और बेबुनियाद आरोप भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 506 (आपराधिक धमकी) के तहत अपराध नहीं बनाते। शीर्ष कोर्ट ने यौन अपराध से बच्चों का का संरक्षण (पॉक्सो) मामले में आरोपी के चाचा, वकील बेरी मनोज के खिलाफ आईपीसी की धारा 506 के तहत दर्ज आपराधिक मामले को खारिज कर दिया।
पीड़िता के दर्ज बयानों में अंतर
बेंच ने गौर किया कि पीड़िता ने जो बयान दिया था, उसमें बाद में बदलाव आया। पहला बयान दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 161 के तहत पुलिस के समक्ष दिया गया था। दूसरा बयान सीआरपीसी की धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दिया गया था।
अपने फैसले में शीर्ष कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कोई वकील अपने पेशेवर काम में होता है, तो उसे डराने-धमकाने के तौर पर नहीं देखा जा सकता और इस मामले में यह जरूरी तथ्य (कि वकील धमकी दे रहा था) पूरी तरह गायब था।
कोर्ट ने कहा कि सीआरपीसी की धारा 164 के तहत दर्ज स्पष्ट बयान से अपराध का इरादा साबित नहीं होता, क्योंकि आपराधिक धमकी के लिए स्पष्ट इरादा होना जरूरी है।
बेंच ने कहा कि अस्पष्ट आरोप और बिना ठोस साक्ष्य के मामले में केवल 'चाचा' के संदर्भ से कोई अपराध सिद्ध नहीं होता।
वकील पर कार्रवाई खत्म, अन्य के खिलाफ मुकदमा जारी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द किया और (वकील) मनोज के खिलाफ 2022 में शुरू हुई कार्रवाई को समाप्त कर दिया, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमे की प्रक्रिया जारी रहेगी। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी डर पैदा करने के इरादे के केवल शब्दों का प्रयोग आपराधिक धमकी (का मामला) नहीं बनाता।
तीन लोगों के खिलाफ 2022 में प्राथमिकी दर्ज हुई थी और जांच पूरी होने के बाद पांच लोगों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल हुआ था, जिसमें मनोज को आरोपी बनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि आरोपपत्र के अनुसार, मनोज पर मुख्य आरोप आईपीसी की धारा 506 के तहत आपराधिक धमकी का था, जो पीड़िता की ओर से घटना के आठ दिन बाद दर्ज बयान पर आधारित था।