महाराष्ट्र के एक मुस्लिम धर्मगुरु ने लैंगिक समानता को लागू करने के लिए एक अजीबो-गरीब तर्क दिया है। उनका कहना है कि यदि लैंगिक समानता ही लानी है तो एक महिला और एक पुरुष को गर्भावस्था को आधे-आधे समय के लिए बांट लेना चाहिए। वे केंद्र सरकार द्वारा हज नीति बनाने के लिए गठित की गई समिति के सुझावों की आलोचना कर रहे थे।
समिति ने नई हज नीति में सुझाव दिया है कि 45 साल से अधिक उम्र की चार महिलाएं एक साथ ‘मेहरम’ के बिना हज पर जा सकती हैं। खून से जुड़े पुरुष रिश्तेदारों को ‘मेहरम’ कहा जाता है, जिनसे वह मुस्लिम महिला शादी नहीं कर सकती है।
2018-22 के लिए प्रस्तावित हज नीति को पूर्व सचिव अफजल अमानुल्लाह की अध्यक्षता वाली ने तैयार किया है। इसके साथ ही उन्होंने हज यात्रा के लिए सब्सिडी खत्म करने का भी सुझाव दिया है।
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एक शीर्ष मुस्लिम धार्मिक संस्था जमियत उलेमा की महाराष्ट्र इकाई के सचिव गुलजार आजमी ने कहा कि मेहरम के बिना महिला को हज पर जाने का सुझाव इस्लाम के खिलाफ है। यह सरकार इस्लाम को समझने और लोगों का विश्वास जीतने की बजाय मुस्लिमों की समस्याएं बढ़ा रही है।
उन्होंने दावा किया कि महिलाओं के संबंध में प्रस्तावित बदलाव पास नहीं हो पाएंगे क्योंकि सऊदी अरब की सरकार ऐसी महिलाओं को वीजा ही नहीं जारी करेगी।
उन्होंने आगे कहा कि यदि यह सरकार महिला और पुरुष में समानता ही लाना चाहती है तो उन्हें बच्चे पैदा करने से शुरू करना चाहिए। ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि महिला और पुरुष दोनों साढ़े चार-साढ़े चार महीने तक गर्भधारण करें। वे केवल हज पर जाने वालों को ही निशाना क्यों बनाते हैं।