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गांधी के सेवाग्राम में तीन दिन - भाग दो

Wed, 22 Aug 2018 10:19 PM IST
सेवाग्राम
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सेवाग्राम - फोटो : Amar Ujala
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सेवाग्राम के पुराने और जर्जर डाक घर से थोड़ा आगे मुख्य सड़क पर बाएँ हाथ पर हमें बापू के सेवा ग्राम का बोर्ड दिखाई दिया। सब कुछ पहले जैसा ही। अलबत्ता दाहिने हाथ पर सेवाग्राम का विस्तार नर आया। एक बोर्ड था यात्री निवास। हमारे ठहरने का प्रबंध यहीं पर है। विकास संवाद के साथी अरविंद ने हमें चाबी दी। नहा धोकर जल्दी से मीडिया संवाद में पहुंचना था। हमारा बेताबी से इंतजार हो रहा था। यात्री निवास के कमरे अच्छे लगे। बिस्तर पर खादी के चादर, तकिए और खादी की ओढ़नी। लेकिन बाथरूम में झटका लगा। नल टूटे। फ्लश सिस्टम खराब। फर्श महीनों से धुला नहीं। टाइल्स गंदे। खिड़की, दरवाजों में धूल ही धूल, लगा आईने की सफाई हुए महीनों हो गए।
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कुल मिलाकर गांधी के इस आश्रय स्थल में गंदगी ने जायका खराब कर दिया। गांधी तो सफाई का बड़ा ध्यान रखते थे। स्वयंसेवा भी करते थे। हमने वहां के कर्मचारी से झाड़ू मांगी। उसने असमर्थता जताई। फिर किसी तरह खुद ही बाथरूम का फर्श साफ किया। तैयार होकर गए। सड़क पार कर शांतिभवन में। वहीं मीडिया संवाद का कार्यक्रम था। सेवाग्राम के अध्यक्ष आर एन प्रभु, विकास संवाद के प्रमुख सचिन जैन, गांधीवादी चिंतक सुगन बरण्ठ, और चिन्मयजी तथा अन्य गणमान्य अतिथि उदघाटन सत्र में थे। 

सत्र का सारांश यह रहा कि गांधीजी और कस्तूरबा के जन्म के डेढ़ सौ साल पूरे होने पर 81 गांधीवादी सामाजिक संस्थाओं ने साल भर कार्यक्रम चलाने का फैसला किया था। इसी के तहत देश भर में आयोजन हो रहे हैं। सेवाग्राम में अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रशिक्षण और शोध केंद्र की शुरुआत होने वाली है। नवंबर में नौजवानों का कैंप कर्नाटक में होगा, राज्यों में गांधी उत्सव होंगे, खादी आंदोलन को तेज किया जाएगा, एक हजार पंचायतों में विकास की नई परिभाषाएं गढ़ी जाएंगी और साहित्य प्रसार अभियान चलाया जाएगा। सुनने में तो यह सब बड़ा अच्छा लग रहा है। 
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आगे बढ़ूं इससे पहले विकास संवाद के बारे में कुछ बता दूं। करीब 17 साल पहले इस स्वयंसेवी संगठन की नींव पड़ी थी। सचिन जैन इसके सूत्र धार हैं। इतने साल में इस संगठन ने जमीनी तौर पर कुछ सामाजिक सरोकारों के साथ जबरदस्त काम किया है। हर साल सामाजिक न्याय, सम्मान, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर इस संगठन का काम वाकई देखने लायक है। आमतौर पर किसी भी एनजीओ के काम मुझे बहुत नहीं लुभाते। पर सचिन ने जिस तरह इसे खड़ा किया है, वह काबिले तारीफ है। हर साल मीडिया के साथ वे एक संवाद करते हैं। इसमें किसी प्रासंगिक मसले पर ठोस बात होती है। इसके अलावा हर साल कुछ पत्रकारों को छह माह की फेलोशिप दी जाती है। प्रत्येक वर्ष 10 प्रशिक्षण कार्यक्रम करते हैं। प्रामाणिक संदर्भ के साथ पुस्तकें प्रकाशित करते हैं। 

करीब 400 पत्रकार इस संगठन से जुड़े हुए हैं। इसके अलावा समसामयिक विषयों पर शोध और दस्तावेजीकरण भी यह समूह करता है। सचिन जी से मेरी पहली मुलाकात 10 साल पूर्व खाद्य सुरक्षा और कुपोषण पर अपनी फिल्म के सिलसिले में हुई थी। फिल्म को बड़ी सराहना मिली थी। बहरहाल। ज्यादा लिखूंगा तो आप एनजीओ की बेजा तारीफ का आरोप लगाने लगेंगे। 

तो वहां मंच से गांधीजी पर चर्चा चल रही थी, इधर दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। कभी-कभी ऐसा होता है कि आप लाख कोशिश कर लीजिए, बोलने वालों की बातों पर ध्यान जाता ही नहीं। दिमाग में कुछ और ही चलता रहता है। मेरे साथ भी आज ऐसा ही हुआ। लोग इतना अधिक क्यों बोलना चाहते हैं? गांधी अपने अलग-अलग रूपों में मानस पटल पर चलते रहे। 

पहला सत्र देर से समाप्त हुआ। इस कारण सभी भूख से बेहाल थे। बोलने वालों को छोड़ कर। उनका पेट बोलने से कभी नहीं भरता। सेवाग्राम की भोजनशाला में सब कतार में लगकर खाना ले रहे थे। खाने के बाद सभी को अपने-अपने जूठे बर्तन राख से मांज कर रखने थे। बचपन याद आया। उन दिनों राख ही तो होती थी। देखकर अच्छा लगा। कॉलेज के दिनों में लगने वाले एन.सी.सी. कैंप की याद आ गई। 
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