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'हार्ड बार्गेनर' मुफ्ती की बेटी महबूबा राजनीति में शाह से खा गईं मात

Tue, 19 Jun 2018 08:45 PM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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महबूबा मुफ्ती
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राजनीति में शह और मात का खेल चलता रहता है। राजनीति की चतुर खिलाड़ी, अपने जमाने के हार्ड बार्गेनर कहे जाने वाले स्व. मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा मुफ्ती भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मात खा गईं। बड़ी ही चतुराई से भाजपा अध्यक्ष ने तीन साल के जम्मू-कश्मीर में नाकामी का ठीकरा मुफ्ती मोहम्मद सईद की पार्टी पीडीपी के सिर पर फोड़ दिया।
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गठबंधन पर उठे थे सवाल

हाल में हमलावरों की गोलियों का शिकार हुए वरिष्ठ पत्रकार शुजात बुखारी ने भी अपनी रिपोर्ट में भाजपा-पीडीपी गठबंधन को पीडीपी के लिए आत्मघाती बताया था। जम्मू-कश्मीर से पीडीपी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि शुजात साहब नहीं रहे, लेकिन उनकी वह रिपोर्ट उन्हें याद है। उन्होंने दुरुस्त बात कही थी। यही हो गया। सूत्र का मानना है कि इससे पीडीपी में अब महबूबा के लिए भी काफी मुश्किल बढ़ जाएगी। पीडीपी में कई नेता भाजपा और केंद्र सरकार के रुख से नाराज हैं। महबूबा मुफ्ती लंबे समय से इन नेताओं को भी नहीं सुन रही थी। दूसरी तरफ घाटी में भी महबूबा मुफ्ती की सरकार का ग्राफ गिरने लगा था। पीडीपी सूत्रों के मुताबिक सत्ता में न रहने के बाद पीडीपी को अब इस तरह की कई स्थितियों से दो चार होना पड़ सकता है।

राष्ट्रीय हितों के आगे सत्ता की भूखी नहीं भाजपा

भाजपा के फिलवक्त दोनों हाथ में देशी घी के लड्डू हैं। पार्टी ने जम्मू-कश्मीर में नाकामियों का ठीकरा पीडीपी की प्रमुख महबूबा मुफ्ती पर फोड़ दिया है। भाजपा महासचिव राम माधव की प्रेस कॉन्फ्रेंस से भी साफ है कि भाजपा महबूबा मुफ्ती की सरकार के कामकाज से खुश नहीं थी। कभी महबूबा के साथ सरकार बनाने के लिए राम माधव और भाजपा दोनों को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। वालिद मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद महबूबा ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने में लंबा समय लिया था। लेकिन अब इस तरह से जम्मू-कश्मीर सरकार के गिर जाने के बाद भाजपा देश भर में संदेश देने में सफल हो गई कि उसने राष्ट्रवाद के नाम पर जम्मू-कश्मीर की सरकार को कुर्बान कर दिया। पार्टी राष्ट्रीय हितों के आगे सत्ता की भूखी नहीं है। माना जा रहा है कि जम्मू-कश्मीर सरकार से समर्थन वापस लेना पूरे देश के लोगों में छवि बदलने में भाजपा की मदद कर सकता है। 
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आतंकियों के खिलाफ होगी सख्त कार्रवाई

नरेंद्र मोदी और अजित डोभाल
गोली का जवाब...

अप्रैल से मई और मई से जून के बीच में 80 से अधिक आतंकी हमले हुए हैं। इनमें से मई और जून के रमजान महीने में आतंकी हमलों की संख्या में कई गुणा बढ़ोतरी हो गई थी। पत्रकार शुजात बुखारी पर हमला, सेना के जवान औरंगजेब को यातना देकर मारना आदि केंद्र सरकार की जम्मू-कश्मीर में बढ़ रही चुनौतियों की तरफ इशारा कर रहा था। भाजपा के नेताओं का कहना है कि जम्मू-कश्मीर की सहयोगी पीडीपी ने उसके हाथ बांध रखे थे। वह रमजान में संघर्ष विराम उल्लंघन समेत तमाम दबावों को बना रही थी।

फिलहाल गेंद अब केंद्र के पाले में है। प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल तीनों का मानना है कि आतंकियों के साथ नरमी नहीं बरती जानी चाहिए। सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत इसी के पक्षधर हैं। यहां तक कि नॉदर्न कमान के कमांडर लेफ्टिनेट जनरल रणदीप सिंह भी कश्मीर में आपरेशन ऑल आऊट के पक्षधर माने जाते हैं। सैन्य सूत्रों का मानना है कि घुसपैठ करने वाले आतंकियों का सेना सख्ती से सफाया कर रही है, लेकिन आतंकियों को मिल रहा समर्थन लगातार परेशानी का सबब बना है। इसको लेकर मोदी सरकार की नीति भी है कि गोली और वार्ता एक साथ नहीं चल सकती। ऐसे में सरकार आतंकियों के खिलाफ सख्त कदम उठा सकती है।

राज्यपाल एनएन वोहरा

राज्यपाल एनएन वोहरा 2008 से जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं। 82 वर्ष के वोहरा जम्मू-कश्मीर की नस-नस से वाकिफ हैं। वोहरा के स्थान पर नये राज्यपाल की नियुक्ति के लिए शीर्ष स्तर पर कई बार चर्चा हुई। गृहमंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के जमाने से लेकर प्रधानमंत्री मोदी के जमाने में कई चेहरों पर विमर्श हुआ। लेकिन अभी तक वोहरा ही जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं। एक बार फिर एनएन वोहरा के नेतृत्व में वहां राज्यपाल शासन लागू होने की प्रबल संभावना है।

राज्य में केंद्र सरकार की चुनौतियां भी बढ़ गई हैं। फिलहाल सरकार ने 26 जून को कार्यकाल खत्म हो रहे वोहरा को बतौर राज्यपाल तीन महीने का सेवा विस्तार दे दिया है, लेकिन समझा जा रहा है कि वह आगे भी राज्यपाल के तौर पर बने रह सकते हैं। 2019 के पहले उनके उत्तराधिकारी के चयन की संभावना कम नजर आ रही है।
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