डॉ. सुनील दोहरे के मुताबिक कई कंपनियों की दवाओं के नाम मिलते जुलते हैं। ऐसे में मरीज या तीमारदार के भ्रमित होने की स्थितियां पैदा होती हैं, जैसे किसी घर में दो बीमारियों के मरीज हैं और तीमारदार दोनों को भ्रमित होकर दवा बदलकर खिला दे। ऐसे में मरीज को भारी नुकसान की आशंका है।
सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, डीटैब 29 नवंबर को इस मुद्दे पर बैठक कर फैसला लेगी। अगर वह प्रस्ताव पर मुहर लगा देती है तो आने वाले दिनों में दवा कंपनियों को ब्रांड का नाम ड्रग कंट्रोलर के पास पंजीकृत कराना होगा। उन्होंने बताया कि ट्रेडमार्क अधिनियम में भी दवाओं का पंजीकरण अनिवार्य नहीं है।
ऐसे में नई व्यवस्था के तहत भ्रम पैदा करने वाली स्थितियों को समाप्त करने का निर्णय लिया जाएगा। फिलहाल दवा का पंजीकरण उसके जेनेरिक के नाम पर होता है, जबकि आने वाले दिनों में जेनेरिक के साथ ब्रांड का नाम भी कंपनियों को दर्ज कराना होगा और मिलता-जुलता या समान नाम होने पर बदलाव की प्रक्रिया भी होगी।
अधिकारी ने बताया कि फिलहाल 10 हजार से भी ज्यादा ऐसी दवाएं बाजार में हैं जिनके नाम मिलते-जुलते हैं। इसकी चपेट में करीब 25 फीसदी दवा बाजार है। याद रहे कि सरकार के सामने कई ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें एक जैसे नाम की वजह से पनपे भ्रम से मरीज और तीमारदारों को परेशानी झेलनी पड़ी है।
प्रस्ताव पर डीटैब के निर्णय लेने के बाद सरकार एक सरकारी आदेश जारी कर ड्रग कंट्रोलर के समक्ष पंजीकरण कराने की व्यवस्था को लागू कर सकती है। इसके बाद बड़े पैमाने पर बाजार में बिक रही दवाओं के नाम बदल सकते हैं।