‘मीडिया ट्रायल’ के कारण किसी व्यक्ति को होने वाले नुकसान को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लेते हुए कहा कि इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है। आपराधिक मामलों में मीडिया की रिपोर्टिंग को लेकर दिशानिर्देश जारी करने पर भी शीर्ष अदालत ने विचार करने का निर्णय लिया है।
चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि किसी आपराधिक मामले में एफआईआर दर्ज की जाती है और आरोपियों को गिरफ्तार किया जाता है। पुलिस संवाददाता सम्मेलन कर आरोपियों को मीडिया के समक्ष पेश करती है। इस आधार पर मीडिया में आरोपियों के बारे में खबरें चलती हैं, लेकिन यदि बाद में आरोपी बेकसूर साबित हो जाता है तब तक उस व्यक्ति की साख पर बट्टा लग चुका होता है। पीठ ने कहा कि यह गंभीर मसला है। यह किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और उसकी छवि से जुड़ा मामला है, लिहाजा इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है।
पीठ ने कहा कि यह याचिका वर्ष 1999 से लंबित है, इस मसले को और नहीं टालना चाहते। लिहाजा 22 मार्च को इस पर अंतिम सुनवाई करने का निर्णय लिया है। पीठ ने अमाइकस क्यूरी गोपाल शंकर नारायण द्वारा दी गई प्रश्नावली पर केंद्र और सभी राज्य सरकारों को दो हफ्ते के भीतर पक्ष रखने के लिए कहा है। पीठ ने कहा कि अगर कोई राज्य तय समय के भीतर पक्ष नहीं रखता तो यह माना जाएगा कि इस मसले पर उसे कुछ नहीं कहना है।
केंद्र व राज्य सरकारों को कई मुद्दों पर अपना पक्ष रखने के लिए कहा गया है। जिनमें मुकदमा दर्ज करने से पहले और बाद में पुलिस को मीडिया को कितनी जानकारी साझा करनी चाहिए। आरोपियों की तस्वीर प्रकाशित करने की इजाजत होनी चाहिए या नहीं? पीड़ित पक्ष की पहचान सार्वजनिक होनी चाहिए या नहीं। सांप्रदायिक हिंसा भड़कने की आशंका होने पर मीडिया को किसी हद तक जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। आदि पर केंद्र व राज्य सरकारों को अपना पक्ष रखना है।