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'मायावती की बौखलाहट बता रही है दाल में कुछ काला है'

Wed, 28 Dec 2016 03:50 AM IST
एम संजय/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : getty
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विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही यूपी का सियासी पारा चरम पर है। राजनीतिक दलों के जरिए एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। भाजपा ने भ्रष्टाचार के मुद्दे के जरिए सपा-बसपा को धूल चटाने की रणनीति बनाई है। तो पीएम मोदी के नोटबंदी कदम की चहू ओर चर्चा जरूर है। मगर इसके सियासी नफा-नुकशान को लेकर भाजपा में भी आत्मविश्वास की कमी नजर आ रही है। इन तमाम पहलूओं और भगवा रणनीति को परखने के लिए केंद्रीय राज्य मंत्री संजीव बालियान से एम संजय ने बातचीत की। पेश है प्रमुख अंश:- 
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बसपा-भाजपा के बीच सियासी तल्लखी बढ़ी हुई है। बसपा प्रमुख मायावती ने भाजपा की मानसिकता को दलित विरोधी बताया है, आरोप को कैसे देखते हैं?
देखिए, देश के ज्यादातर हिस्सों में दलित भाजपा के साथ है। बसपा प्रमुख मायावती दलितों को महज राजनीतिक ढ़ाल के रूप में इस्तेमाल करती हैं। जब-जब उनपर भ्रष्टचार के आरोप लगते हैं वह दलित कार्ड को आगे करती हैं। और जब सत्ता आती है तो दलितों का विकास भूल जाती हैं। मायावती दलित की नहीं दौलत की बेटी हैं। जबकि भाजपा की नीति अंत्योदय के रास्ते पर बढ़ते हुए सबका विकास करना है। यही वजह है कि लोकसभा चुनाव में अधिकांश आरक्षित सीटों पर भाजपा की जीत हुई।

बसपा के खाते में जमा 103 करोड़ के रकम पर मायावती ने कहा है कि उनके पास एक-एक पैसे का हिसाब है। तो फिर इसपर सियासत क्यों, अन्य दलों की भी जमा रकम बाहर आनी चाहिए?
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यह बात किसी से छीपी नहीं है कि मायावती ने पैसे लेकर टिकट दिए हैं। सूबे की सभी 403 विधानसभा सीटों पर माया ने प्रत्याशी से 2 से 3 करोड़ लेकर उन्हें उम्मीदवार बनाया है। यह आरोप भाजपा की ओर से नहीं बल्कि खुद बसपा प्रमुख के साथ कार्य कर चुके लोगों ने लगाया है। अगर मायावती के पास एक-एक पैसे का हिसाब है तो वह बौखलाहट में क्यों है। उन्हें जांच का सामना करना चाहिए। यदि उनके दल के खाते में जमा पैसा ठीक होगा तो वे आरोपों से बेइज्जत बरी होंगी। सियासी आरोप प्रत्यारोप के बजाय उन्हें मुस्तैदी से जनता के सामने बसपा के खाते में जमा पैसों का हिसाब देना चाहिए। लेकिन मायावती की बौखलाहट बता रही है कि दाल में कुछ काला जरूर है। 

बसपा प्रमुख के भाई आनंद के खिलाफ आईटी विभाग की कवायद को बदले की कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। केंद्र का यह कदम सियासी लाभ के लिहाज से तो नहीं?
मायावती के भाई जिनका आप नाम ले रहे हैं। वे यूपी के भ्रष्टतम लोगों में एक रहे हैं। अगर इंकम टैक्स ने उनपर कोई कार्रवाई की है तो उसके पास आनंद के काले करतुतों की फाईल होगी। मायावती के राज में उन्होंने काफी लूट-पाट मचाई थी। यूपी के इतिहास में माया की सरकार को सबसे भ्रष्ट सरकार माना जाता है। नौएड़ा - एनसीआर के बिल्डरों के यहां उनकी अच्छी खासी इंवेस्टमेंट है। आईटी की कार्रवाई को राजनीतिक बदले की भावना बताना गलत है। आईटी की रेड यूंही नहीं होती। यदि आनंद काली कमाई के धंधे में संलिप्त नहीं हैं तो उन्हें जांच से डरना नहीं चाहिए। 


नोटबंदी का असर खेती-किसानी पर ज्यादा माना जा रहा है। आने वाले दिनों में विधानसभा के चुनाव हैं। भाजपा के सियासी मंसूबों पर क्या असर पड़ेगा?
निश्चित रूप से किसान और आम लोगों को नोटबंदी के वजह से कुछ असुविधाओं का सामना करना पड़ा है। मगर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में लोग पीएम मोदी के कदम से प्रसन्न हैं। उन्हें पीएम मोदी की नियत में पूरा विश्वास है। उन्हें मालूम है कि सरकार के इस कदम से देश का भविष्य बेहत्तर होगा। नोटबंदी से आम आदमी को होने वाली कठीनाईयों को समझते हुए सरकार ने तत्काल सुधार के कदम उठाए। लोगों को विश्वास है कि देश से कालाधन खत्म होगा। उन्हें पीएम मोदी में पूरा विश्वास है। 
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'दलितों को राजनीतिक ढ़ाल के रूप में इस्तेमाल करती हैं मायावती'

- फोटो : getty
यूपी में भगवा माहौल बनाने के मकसद से शुरू हुई भाजपा की परिवर्तन यात्रा भी समाप्त हो गई है। यूपी के सियासी मैदान पर आप भाजपा को कहां देखते हैं?
परिवर्तन यात्रा में यह सामने आया कि पहली बार यूपी में खासतौर से पश्चिमी यूपी में किसान और ग्रामीण इलाकों के लोगों ने यात्रा में बढ़चढ़कर भाग लिया। भाजपा की परिर्वतन यात्रा ने किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के आयोजनों की याद ताजा करा दी। ट्रैकटर-ट्राली में किसान और ग्रामीण भर-भर कर भाजपा की यात्रा में पहुंचे। पहले यह नजरा टिकैत के आंदोलनों में दिखता था। करीब दो करोड़ से ज्यादा लोगों से यात्रा के जरिए पार्टी का संपर्क हुआ। दावे के साथ कहता हुं कि यूपी में अगली सरकार भाजपा की बनेगी। सपा-बसपा सरकारों का भ्रष्टाचार हमारा चुनावी मुद्दा होगा। 

गन्ना किसानों की समस्या जस की तस है, उनका बकाया नहीं मिल पा रहा है। उपर से यूपी में किसानों को आलू मुफ्त बांटनी पड़ी है। किसानों के अच्छे दिन कब तक?
महज मोदी, सिंभावली और राणा सरीखे चंद चीनी मिलों के यहां ही किसानों का बकाया रह गया है। इन तीनों पर प्राथमिकि दर्ज है। राज्य सरकार इन मिल मालिकों पर कार्रवाई नहीं कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को भी नजरअंदाज किया जा रहा है। कानून व्यवस्था का मामला चुकी राज्य सरकार के हाथ में है। इसलिए हमारे हाथ बंधे हैं। विश्वास दिलाता हुं कि सूबे में भाजपा की सरकार बनने के 15 दिन के भीतर ये तीनों मिल मालिक जेल में होंगे। एक-एक गन्ना किसान का पैसा मिलेगा। आलू के मामले में भी राज्य सरकार ने ढ़िलाई दिखाई है। मूल्य स्थिरिकरण फंड के जरिए वह किसानों का आलू खरीद सकती है। केंद्र ने फंड आंवटित किया हुआ है। 

जाट आरक्षण का मामला भी अभी अटका हुआ है। कब तक मिल सकेगा जाटों का आरक्षण ?
राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष का पद अभी रिक्त है। पहली बार जाट आरक्षण देते समय पूरी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। जिसके वजह से ही कठीनाई पैदा हुई है। इसलिए अभी दोबारा से सर्वे कराने के साथ राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग की संस्तुति करवानी जरूरी है। जल्द ये प्रयास पूरे होंगे। 
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