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ब्यूटी पार्लर से लेकर ऐशो आराम तक, क्या-क्या था 'रामवृक्ष के बाग' में

Sat, 04 Jun 2016 11:57 AM IST
चंद्रमोहन शर्मा/अमर उजाला, मथुरा
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जवाहर बाग कहने के लिए जंगल था, लेकिन अंदर बसा था पूरा शहर। ऐसा शहर जिसमें आटा चक्की, राशन डिपो, सब्जी मंडी, सैलून, ब्यूटी पार्लर समेत तमाम सुविधाएं थीं। खुद को गरीब-मजदूर बताने वाले कब्जाधारियों के पास बाइक, स्कूटर और लग्जरी गाड़ियां भी थीं।
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सरकार ने बिजली काटी, तो पूरा सोलर सिस्टम लगा लिया। उद्यान विभाग के कुए और ट्यूबवेल कब्जा लिए। जवाहरबाग खाली हुआ तो वहां राख के ढेर ही ढेर नजर आए। इनके बीच ही कहीं फुंका हुआ टीवी पड़ा था, कहीं कूलर के अवशेष थे।

रसोई गैस के सिलेंडर भी थे और बाइक के पुर्जे थे। मिट्टी के कच्चे घर थे। छतों की जगह छप्पर थे। लेकिन सुविधाएं तमाम थीं। ट्रकों में सामान आता था। सोलर सिस्टम से टीवी चलाए जाते थे। लाउडस्पीकर गूंजते थे।
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उद्यान विभाग के ट्यूबवेल से पाइप लाइन डाली गई जो घरों तक जाती थी। 280 एकड़ का जवाहर बाग  एक छोटी रियासत बन गया था और इसका मालिक था रामवृक्ष यादव। उसने दो दिन के लिए प्रशासन से बाग में प्रवास की अनुमति मांगी थी लेकिन इसे खाली नहीं किया। यह खाली हुआ ढाई साल बाद। वो भी तब जब गोलियां चलीं और 27 लाशें बिछ गई।
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अंदर चल रही थी हथियारों की फैक्ट्री

mathura - फोटो : amar ujala
पुलिस ने जवाहर बाग खाली कराने केबाद सर्च आपरेशन चलाया। यहां हथियारों का जखीरा मिला। अधबने हथियार भी मिले। तमंचों की नाले थीं, पाइप थे। माना जा रहा है कि अंदर ही हथियारों का कारखाना चल रहा था।

नक्सलियों की तरह से कराई जाती थी ट्रेनिंग
बाग के अंदर सिर्फ रिहायश नहीं थी बल्कि कब्जाधारियों ने ट्रेनिंग सेंटर भी बना रखा था। आसपास के लोग बताते हैं कि यहां पर कुछ युवकों को नक्सलियों की तरह से ट्रेनिंग दी जाती थी। उन्हें पेड़ पर चढ़ना और हमला करने के साथ-साथ बचाव के भी गुर सिखाए जाते थे। लोगों का कहना है कि डंडों और फरसों का प्रदर्शन तो अक्सर होता रहता था लेकिन हथियार कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। ट्रेनिंग लेने वाले अधिकांश युवक ही होते थे।

ट्रकों में आती थी रसद
रात के अंधेरे में ट्रकों से रसद आती थी। इसमें गेहूं, धान, चीनी, तेल होता था। रसोई गैस के सिलेंडर भी आते थे। कब्जाधारियों के पास पैसा कहां से आता था? इस पर दो थ्योरी हैं। पुलिस सूत्रों की मानें तो रामवृक्ष सत्ताधारियों के करीब था। वे उसे फाइनेंस करते थे। दूसरा, वह नक्सलियों के संपर्क में था। वहां से भी पैसा आता था।

कब्जाधारियों में पूर्वांचल के लोग ज्यादा
रामवृक्ष यादव के बारे में बताया जा रहा है कि उसकी मौत हो गई। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं है। वह गाजीपुर का था। उसे मानने वाले भी गाजीपुर, आजमगढ़, वाराणसी, चंदौली के ज्यादा थे। इसके अलावा कई कब्जाधारी बिहार के भी बताए गए हैं।
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