नोटबंदी से खुदरा कारोबार की कमर टूट गई है। बाजारों पर मंदी की तगड़ी मार पड़ी है। अब थोक कारोबारियों ने भी उधार पर परचून कारोबारियों को सामान देना बंद कर दिया है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, शिमला, जम्मू-कश्मीर, पंजाब और हरियाणा में थोक और खुदरा दोनों तरह का कारोबार लड़खड़ा गया है।
यूपी में राजधानी का थोक एवं खुदरा कारोबार जमीन पर आ गया है। पहले जहां रोजाना थोक एवं खुदरा कारोबार 1000 करोड़ रुपये का होता था 19 नवंबर तक वह 50 फीसदी पर सिमट गया। लखनऊ के बाजार सूने हैं और सराफा कारोबार की रौनक फीकी पड़ चुकी है। उत्तराखंड में नोटबंदी के बाद के पहले आठ दिनों में ही 70 फीसदी खुदरा कारोबर गिर चुका था। किराना की दुकान चलाने वाले अभिषेक ने बताया कि अधिकांश कारोबार उधारी पर रहा अब तो आगे से भी बिना पैसे के माल नहीं मिल रहा है। ग्राहकों की संख्या घट गई है।
हिमाचल प्रदेश में किराना, कपड़ा और जूता कारोबारियों का कारोबार बीते एक सप्ताह के दौरान 50 फीसदी तक घट गया है। एक साल पुरानी उधारी को चुकता करना मुश्किल हो गया है। सराफा बाजार में 90 फीसदी तक कारोबार घट गया है। शिमला ज्वेलर्स एसोसिएशन के सचिव अतुल टांगरी के मुताबिक बाजार में नकदी की कमी से कारोबारियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जम्मू-कश्मीर में 2000 करोड़ रुपये से अधिक के थोक तथा खुदरा कारोबार के प्रभावित होने की आशंका है। पंजाब में खुदरा कारोबार में 70 से 80 फीसदी तक की गिरावट आई है। लुधियाना के पंजाब प्रदेश व्यापार मंडल के सचिव महेंद्र अग्रवाल के मुताबिक छुट्टे की समस्या से खरीद-बिक्री प्रभावित हुई है। मुक्तसर के खुदरा व्यापारी अमृत लाल खुराना ने बताया कि खुदरा व्यापार 50 फीसदी तक खत्म हो गया है।
पटियाला में पेंट के खुदरा व्यापारी राकेश गुप्ता का कहना है कि कारोबार में 70 से 80 फीसदी तक की गिरावट आई है। हरियाणा में खुदरा कारोबार 50 फीसदी तक गिर गया है। कारोबारियों के मुताबिक लोग केवल रोजमर्रा के जरूरत का सामान ही खरीद रहे हैं। यमुनानगर में एशिया की सबसे बड़ी लक्कड़ मंडी ठप होने लगी है।
15 दिनों से मजदूरों को नहीं मिल रहा काम
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दोपहर करीब दो बजे का वक्त था। आम दिनों में गांधी नगर के भगवानदास चौक पर बढ़ई, राजगीर, पेंटर जैसे सैकड़ों दिहाड़ी मजदूर लंच करते दिखते थे। लेकिन शुक्रवार को नजारा दूसरा ही था। बाइक रुकते ही मात्र आठ-दस कामगार आधे दिन की दिहाड़ी बताते हुए दौड़ पड़े। नजदीक आने पर नोटबंदी और उसके असर से जुड़े सवालों से कुछ लोग मायूस होकर वापस लौट गये। जबकि कुछ अपनी बेकारी की कहानी बयां करने लगे।
गांधी नगर के बाजार में लेबर चौक पर दिखने वाले मजदूरों की भीड़ नोटबंदी के चलते छंट गई है। यहां पर जो मजदूर है वह भी काम की तलाश में पूरा दिन बैठे-बैठे बिता दे रहे हैं। पिछले तीस साल से बढ़ई का काम करने वाले बुजुर्ग फखरूद्दीन ने कहा, बेटा, यह रोटी का समय है।
लेकिन खाना खाने की जगह हमारी नजरें काम करवाने वालों को तलाश रही हैं। हालात इसी से समझ सकते हो। पिछले करीब पंद्रह दिनों से हम बेकार हुए बैठे हैं। जब कमाई नहीं होगी तो हम खायेंगे क्या? अब इंसान का भरोसा नहीं रहा। ऊपर वाला ही कुछ कर सकता है।
नोटबंदी से मजदूरों का काम ठप
पूर्वी दिल्ली का बड़ा लेबर चौराहा भगवानदास चौक पर फिलहाल इसी तरह के चंद मायूस दिहाड़ी मजदूर दिख जाते हैं। जबकि महीने भर पहले यहां मजदूरों की संख्या सैकड़ों में थी। दिन भर काम करते और जरूरत के हिसाब से बचत कर मजदूर सुख की नींद सोते लेकिन नोटबंदी ने इनके काम को ठप कर दिया है। राजगीर का काम करने वाले तसलीम बताते हैं कि जब पैसा नहीं है तो काम कहां से पैदा होगा।
लोग घर चलाने के लिए पूरे दिन बैंक की लाइन में लगते हैं। ऐसे में काम करवाने की कौन सोच सकता है। पिछले कई सालों से ऐसा पहली बार हुआ है जब हमें पंद्रह दिनों तक बेकार बैठना पड़ा। इससे परेशान होकर बड़ी संख्या में हमारे जैसे लोग अपने घर वापस चले गए।
चालीस साल से बढ़ई का काम करने वाले सेठजी बताते हैं कि आज यहां पचास फीसदी से भी कम मजदूर बचे हैं। जिनके पास घर पर कुछ खेतीबाड़ी है, वह वापस लौट गए। कम से कम घर पर पेट तो भरेगा। अगर यही आलम रहा तो महीने के आखिर तक पेट भरना मुश्किल होगा। भगवानदास की हवेली पर हमने पहली बार इस तरह का आलम देखा है।
भगवान दास चौक ही नहीं, यहां पर गारमेंट के बाजार में भी मजदूरों का भारी टोटा है। व्यापारी श्याम के अनुसार मजदूरों की समस्या से उन्हें भी दो चार होना पड़ रहा है। पहले चार मजदूरों को माल लाने ले जाने के काम पर लगाते थे लेकिन खुले पैसों की कमी से अब उन्हें बुलाने में मुश्किल हो रही है। ग्राहक कम होने से काम भी कम है।