इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी की प्रमुख डॉक्टर वनश्री सिंह ने अमर उजाला को बताया कि कोरोना काल की शुरुआत में उनके यहां रक्तदाताओं की संख्या में भारी कमी आई थी।
सोसाइटी अपने रक्तदान शिविर भी नहीं लगा पा रही थी, लेकिन उनके लगातार उत्साहवर्धन से अब लोग रक्तदान करने आ रहे हैं। वे रोजाना एक से दो कैंप लगा रही हैं, जिससे पर्याप्त मात्रा में रक्त उपलब्ध हो पा रहा है।
वनश्री सिंह के मुताबिक इस समय रेड क्रॉस रोजाना 250 यूनिट के लगभग रक्त उपलब्ध करवा रहा है। रक्त लेने वालों में थैलेसीमिया के स्थाई मरीजों के अलावा एम्स, सफदरजंग अस्पताल, लेडी हार्डिंग और कई प्राइवेट अस्पताल के मरीज भी शामिल हैं।
राजधानी दिल्ली में लगभग 2400 थैलेसीमिया के मरीज हैं। इनके रक्त में हीमोग्लोबीन का स्तर 9.5 प्वाइंट से कम होने पर (या डॉक्टर की सलाह पर) दोबारा चढ़ाया जाता है।
लेकिन कोरोना काल में प्रतिबंधों के कारण गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा या अन्य जगहों के मरीज दिल्ली नहीं आ पा रहे हैं। उन्हें उनकी जगहों पर ही रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित कराई जा रही है।
प्रतिवर्ष सात से 10 हजार थैलेसीमिया ग्रस्त बच्चे पैदा होते हैं जिन्हें आजीवन रक्तदान पर ही निर्भर करना पड़ता है, क्योंकि इनका रक्त हवा से ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा ग्रहण नहीं कर पाता। पूरे भारत में लगभग 2.5 लाख लोग थैलेसीमिया से पीड़ित हैं।
एक बार किया गया रक्तदान सामान्य पैकिंग में 42 दिन से लेकर विशेष पैकिंग के साथ एक वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। रक्तदान के बाद कोई भी सामान्य व्यक्ति तीन महीने के बाद दोबारा रक्तदान कर सकता है, जबकि शरीर में यह लगभग 36 दिन में दोबारा बन जाता है।
वहीं प्लाज्मा के लिए हफ्ते या दस दिन में दो बार प्लाज्मा दान किया जा सकता है। इसका उपयोग किसी रोग प्रतिरोधी क्षमता विकसित होने के बाद उस बीमारी से संबंधित रोगी के उपचार में किया जाता है।