भारत में मनमोहन सिंह को लेकर लोग जो भी राय बनाते रहे हों, लेकिन दुनिया उन्हें किस ऊंचे पायदान पर रखती थी, इसका अंदाज उनके साथ विदेश यात्राओं पर जाने से मिलता था। बात 2012 की है। जी-20 शिखर सम्मेलन मैक्सिको के लॉसकाबोस शहर में था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन के साथ जाने वाले प्रतिनिधिमंडल में बतौर पत्रकार मैं भी शामिल था। तय समय पर सारे पत्रकार शिखर सम्मेलन स्थल पर पहुंच गए। मीडिया के लिए निर्धारित कक्ष से हमें पूरे मंडप का नजारा दिख रहा था। हमने देखा कि एक-एक कर सभी राष्ट्राध्यक्ष आ रहे हैं और मंडप के बाहर पोर्च में मैक्सिको के प्रोटोकॉल मंत्री उनका स्वागत कर रहे थे।
इन अति विशिष्ट राष्ट्राध्यक्षों में अमेरिका, रूस, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे देशों के शीर्ष नेता थे। अचानक मैक्सिको के राष्ट्रपति बाहर पोर्च में आकर खड़े हो गए। हमारी उत्सुकता बढ़ गई कि राष्ट्रपति किसके लिए आए हैं। तभी चीन के राष्ट्रपति आए और मैक्सिको के राष्ट्रपति उन्हें अपने साथ भीतर ले गए। पर हम फिर चौंके जब मेजबान राष्ट्रपति फिर पोर्च में आ गए। हमारी खुशी का ठिकाना न रहा, जब हमने देखा कि हमारे प्रधानमंत्री की तिरंगा लगी कार आई और मेजबान राष्ट्रपति ने आगे बढ़कर मनमोहन का स्वागत किया। उन्हें ससम्मान भीतर ले गए। हमारे लिए बड़ा सवाल था कि आखिर सिर्फ भारत और चीन के राष्ट्राध्यक्षों को ऐसा सम्मान क्यों मिला। इसका जवाब भी जल्दी ही मिल गया, जब हमने देखा कि मंच पर सबसे ज्यादा किसी की पूछ थी, तो वह भारत व चीन के राष्ट्राध्यक्षों की। उनमें भी डॉ. मनमोहन सिंह को सारे विश्व नेता घेरे हुए थे। हम लोगों ने बाद में भारतीय प्रोटोकॉल अधिकारियों से पूछा कि आखिर क्या बात हो रही थी, तो पता चला, सारे वैश्विक नेता मनमोहन सिंह से जानना चाहते थे कि आखिर भारत ने 2008 की वैश्विक मंदी से खुद को कैसे बचाया। हमारे प्रधानमंत्री चिरपरिचित शैली में किसी शिक्षक की तरह उन्हें समझा रहे थे।
ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में रियो-20 पृथ्वी सम्मेलन में चीन के तत्कालीन राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन की द्विपक्षीय भेंट थी। मनमोहन थोड़ी देर से पहुंचे और देरी के लिए खेद प्रकट किया, तो चीनी राष्ट्रपति ने गर्मजोशी से कहा, दुनिया के नामी अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री का स्वागत करना मेरे लिए गौरव की बात है।
यह एक उदाहरण है मनमोहन की वैश्विक पहचान और प्रतिष्ठा की, लेकिन मनमोहन को अपने इस सम्मान से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनकी सहजता और विनम्रता वैसी ही रहती थी।
सहजता इतनी...कमजोरी मानते थे कांग्रेसी
मनमोहन की सहजता और विनम्रता के अनेक किस्से हैं। वित्त मंत्री बनने पर जो सहजता थी, पीएम बनने के बाद भी वैसी ही रही। जब केंद्र में एनडीए सरकार थी और मनमोहन राज्यसभा में कांग्रेस के नेता सदन थे, तब अक्सर उनसे संसद भवन में मुलाकात होती थी। बेहद विनम्र और धीमे बोलने वाले मनमोहन पत्रकारों के सवालों का जवाब बेहद शालीनता से देते थे। कभी उन्हें नाराज या असहज होते नहीं देखा गया। वह अपनी मारुति कार खुद चलाकर आते। कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता उनकी सहजता को अक्सर उनकी कमजोरी कहते थे, क्योंकि वह कभी भी सदन में सरकार पर उस तरह हमलावर नही होते थे, जिसकी आदत आम विपक्षी नेताओं को होती है।
सोनिया संग टकराव की नहीं आने दी नौबत
यूपीए सरकार के दस साल में सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के बीच झगड़ा कराने की काफी कोशिशें हुईं। लेकिन दोनों की समझदारी थी कि ऐसे तत्व सफल नहीं हो सके। कई बार दोनों के बीच किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बन पा रही थी, पर कभी सोनिया तो कभी मनमोहन ने पीछे हटकर टकराव की नौबत नहीं आने दी। अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु समझौते को लेकर वामपंथी नेताओं के प्रभाव में सोनिया शुरू में असहज थीं, लेकिन जब मनमोहन ने उन्हें इस समझौते से भारत को होने वाले फायदे समझाए और बताया कि वह भारत के हितों से कभी समझौता नहीं करेंगे, तो सोनिया ने कुछ सुझाव दिए, जिन्हें मनमोहन ने अमेरिका पर दबाव डालकर समझौते में शामिल कराया।
अमेरिका के साथ रक्षा सौदों को लेकर भी सोनिया के सवालों को मनमोहन सिंह ने सुलझाया। तमाम नियुक्तियों में मनमोहन सिंह को पूरी छूट थी, तो महमोहन ने भी कई बार सोनिया की राय का सम्मान किया।
एक किस्सा है सीबीआई निदेशक पद पर नियुक्ति का। मनमोहन एक नाम तय कर चुके थे, लेकिन सोनिया के तत्कालीन राजनीतिक सचिव अहमद पटेल ने प्रधानमंत्री को बताया कि मैडम किसी और नाम के पक्ष में हैं, पर आपके फैसले में दखल नहीं देना चाहतीं। तब मनमोहन ने सोनिया से फोन पर बात की और एक ऐसे नाम पर सहमति बनाई जो वरिष्ठता में पैनल में सबसे ऊपर थे।
राहुल ने सरकार का अध्यादेश फाड़ा तो भी धैर्य नहीं खोया
राहुल गांधी ने जब अपनी ही सरकार का वह अध्यादेश पत्रकारों के बीच फाड़ा, जिसे कैबिनेट ने मंजूरी दे दी थी, उस समय मनमोहन सिंह अमेरिका की यात्रा पर थे। उन्हें जब पता चला, तो उन्हें इसकी तकलीफ तो हुई, लेकिन उन्होंने इसे सार्वजनिक नहीं होने दिया और खुद को संभाल लिया। इस मौके का फायदा भी कुछ दरबारियों ने उठाना चाहा, लेकिन मनमोहन सिंह ने उन सबको निराश कर दिया और सोनिया परिवार से अपने रिश्ते नहीं बिगाड़े।
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