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मणिपुर में धड़कते दिल और बेचैन निगाहों से नतीजों का इंतजार

Fri, 10 Mar 2017 07:09 PM IST
रीता तिवारी/ अमर उजाला, इंफाल
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पूरे देश की निगाहें भले उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों पर लगी हों, कम से कम एक पार्टी और एक व्यक्ति तो ऐसा है जिसे पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर के नतीजों का भी बेसब्री से इंतजार है। नतीजों से एक दिन पहले  लगातार तीन बार कांग्रेस सरकार की अगुवाई कर चुके मुख्यमंत्री इबोबी सिंह और सत्ता की प्रमुख दावेदार के तौर पर उभरी भाजपा को धड़कते दिल और बेचैन निगाहों से नतीजों का इंतजार है।
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यही एकमात्र ऐसा राज्य था जहां एक पार्टी यानी भाजपा का मुकाबला एक व्यक्ति यानी इबोबी सिंह से था। ऐसे में नतीजों से एक दिन पहले दोनों पक्षों की धड़कने बढ़ना लाजिमी है। इस चुनाव में इबोबी की साख दांव पर थी तो दूसरी ओर भाजपा की नाक।

कहने को तो राज्य में  इस बार मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच था। लेकिन बीते दिनों कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं के दल बदलने के बाद कांग्रेस के लड़ाई इबोबी के कंधे पर ही थी। वैसे भी तमाम प्रतिकूल हालातों के बावजूद लगातार तीन बार यहां कांग्रेस सरकार को सत्ता में बिठाने वाले इबोबी सिंह राज्य में पार्टी के पर्याय तो पहले ही बन गए थे। 
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दो की निगाहें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है

- फोटो : BBC
इस बार उनकी अग्निपरीक्षा थी। अपने 15 साल लंबे कार्यकाल के दौरान इबोबी को कई मुश्किल परिस्थितियों से जूझना पड़ा है। लेकिन अपने राजनीतिक कौशल और राज्य की नब्ज पर मजबूत पकड़ के बूते वे हर बार कामयाब साबित होते रहे हैं। अगर वे अपनी सरकार बचाने में कामयाब रहते हैं तो मणिपुर की राजनीति पर उनकी बादशाहत एक बार फिर साबित हो जाएगी। वैसे, इबोबी के हौसले बुलंद हैं। 

उनका दावा है कि कांग्रेस राज्य की 60 विधानसभा सीटों में से कम से 40 सीटें जीतेगी। राज्य में नए जिलों के गठन के उनके फैसले के विरोध में बीते 130 दिनों से नगा संगठनों ने यहां आर्थिक नाकेबंदी लागू कर रखी है। बावजूद इसके अगर लोग लगातार चौथी बार उनको चुनते हैं तो इसका श्रेय इबोबी के करिश्माई व्यक्तित्व को ही जाएगा।

दूसरी ओर, दावे तो भाजपा भी यहां बहुमत पाने का कर रही है। लेकिन उसकी मुश्किल यह है कि उसने चुनाव से पहले किसी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार नहीं घोषित किया था। इसकी वजह कांग्रेस से आने वाले कई दलबदलू नेता रहे। उनमें से कम से कम दो की निगाहें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर है। 

भाजपा के स्थानीय नेताओं ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से किसी को इबोबी के मुकाबले मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर सामने रखने की अपील की थी। लेकिन कुर्सी के दावेदार ज्यादा होने की वजह से ही शायद भाजपा नेतृत्व इससे बचता रहा। कांग्रेस से सत्ता छीनने के लिए भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान कई ऐसे वादे भी कर दिए जो सत्ता में आने के बाद उसके लिए भारी परेशानी का सबब बन सकते हैं। 
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