मणिपुर हिंसा के कई दिन बीत गए, भले ही कहा जा रहा है कि स्थिति नियंत्रण में हैं लेकिन अभी भी कई जिलों में हालात तनावपूर्ण बने हुए हैं। ये स्थिति और बदलतर हो जाती अगर केंद्र सरकार समय पर हरकत में नहीं आती और दखल नहीं देती। स्थिति की गंभीरता इस बात से लगाई जा सकती है कि गृहमंत्री अमित शाह को अपना कर्नाटक का दौरा तक रद्द करना पड़ा। वे लगातार दिल्ली से स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। वे पूरी तरह से मणिपुर पर फोकस किए हए हैं।
अगर समय पर केंद्र सरकार हरकत में नहीं आती मणिपुर के हालात बद से बदतर हो सकते थे, इसमें कोई शंका नहीं है। ऐसे हालात क्यों हुए क्योंकि मणिपुर सरकार विरोध-प्रदर्शन का आकलन करने में पूरी तरह से चूक गई। पूरा तंत्र फेल हो गया। राज्य का खुफिया विभाग नकारा साबित हुआ।
गृह विभाग के नीचे उपद्रवी दो दिनों तक नंगा नाच करते रहे। बम और गोलियां चलीं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि सालों से एक साथ रहने वाले ये मैतेई और ट्राइबल एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। पहाड़ में मैतेई और मैदन में ट्राइबल अपनी जान की भीख मांगते रहे। लोगों के घर जला दिए गए। जख्म बड़े गहरे हैं, भरने में शायद अभी वक्त लगेगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल है, क्या यह एक दिन में हुआ, इसे समझने की जरूरत है।
मणिपुर वास्तव में पहाड़ और घाटी में बसा हुआ है। पहाड़ी जिलों में अधिकतर ट्राइबल लोग रहते हैं और घाटी में मैतेई। बुधवार को भड़की हिंसा में पहाड़ी जिलों में मैतेई लोगों पर ट्राइबलों ने हमले किए जबकि घाटी में ट्राइबलों पर मैतेई लोगों ने। मैतेई समुदाय के लोग एसटी की दर्जा मांग कर रहे हैं। जबकि ट्राइबल लोग इसका विरोध कर रहे हैं।
उनका मानना है कि अगर मैतेई समुदाय को को एसटी का दर्जा मिल गया तो एसटी को मिलने वाली सभी सुविधाओं पर उनका कब्जा हो जाएगा। इस बीच, मणिपुर हाईकोर्ट ने मैतेई को एसटी का दर्जा देने के संबंध में जारी किए गए निर्देश के बाद हालात बिगड़ने लगे। इसके खिलाफ गत मंगलवार को पहाड़ी जिले चुराचांदपुर में ट्राइबल के एक छात्र संगठन ने रैली निकाली थी। मणिपुर के सीएम के कार्यक्रम के एक दिन पहले चुराचांदपुर जिले में जमकर आगजनी हुई थी।
हालात को देखते हुए मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह को अपना दौरा रद्द करना पड़ा था। इतने पर भी प्रशासन के कान खड़े नहीं हुए। इसके बाद लगातार छात्र संगठन रैलियां कर रहे थे, लेकिन सरकार को कानोंकान खबर नहीं लगी। यह सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात है। उसके बाद बुधवार को एक और बड़ी रैली हुई, जिसके बाद रात से हालात बेकाबू होने लगे और स्थिति यहां तक पहुंची। केंद्र सरकार तुरंत हरकत में आई और सेना, असम राइफल्स और भारतीय वायु सेना को काम में लगाया।
सेना स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी। अब जो जानकारियां धीरे-धीरे निकलकर सामने आ रही हैं, उससे अनुमान लगाया जा रहा है कि मामला केवल मैतेई को एसटी का दर्जा देने तक ही सीमित नहीं है। इसके पीछे बहुत से तंत्र और संगठन काम कर रहे हैं, क्योंकि यह नहीं भूलना चाहिए कि मणिपुर एक संवेदनशील राज्य है।
इसके साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाएं भी लगती हैं। सरकार जंगलों में अवैध निर्माण के खिलाफ भी कठोर कदम उठा रही है। इनर लाइन से जुड़े मसले पर भी सरकार काम कर रही है। जैसा कि मुख्यमंत्री एन.बीरेन सिंह ने शांति की अपील करते हुए कहा था, वर्षों की भाईचारे और सौहार्द्र को बिगड़ने नहीं देंगे। यह भी समझने की जरूरत है कि आखिर कौन लोग हैे जो इस भाईचारे को तार-तार करना चाहते हैं। हो सकता है, दो-एक दिन में स्थिति सामान्य हो जाए।
अब सरकार की जिम्मेदारी है कि वह राज्य के अंदर और सीमा के बाहर उन तत्वों को खोजे, उनकी पहचान करे और सख्त से सख्त कार्रवाई करे, ताकि फिर भविष्य में इस तरह की घटनाएं दोहराईं नहीं जा सकें। मणिपुर की जनता भय और त्रासदी झेर में जी रही है।
स्थिति नियंत्रण में आ रही है...धीरे-धीरे जीवन भी पटरी पर लौट आए लेकिन सरकार के आकलन नहीं कर पाने की 'चूक' से जो मणिपुर को जख्म मिले हैं, उसको भरने में शायद अभी वक्त लगेगा।
म्यांमार में बैठे विद्रोही संगठनों ने रची साजिश, भड़काई आग
मणिपुर हिंसा को लेकर पुख्ता सबूत मिल रहे हैं कि इस साजिश के पीछे सीमा पार म्यांमार में बैठे विद्रोही संगठनों का हाथ है। मणिपुर को जलाने की साजिश सीमा पार से विद्रोही गुटों ने सीमा के अंदर सरेंडर कर चुके अपने कुछ साथियों के माध्यम से रची। इसमें सबसे ऊपर कुकी विद्रोही गुटों का नाम आ रहा है। वे काफी समय से ताक में थे, और मैती को एसटी का दर्जा दिए जाने का बहाना उनको मिल गया। ये भी जानकारी मिल रही है कि विद्रोही गुटों के सदस्य भी आम जनता में घुस गए हैं, जिसके चलते सेना और सुरक्षाबलों को मणिपुर में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
कुकी विद्रोहियों वाले पूर्वोत्तर के सभी राज्यों को किया सतर्क
पूर्वोत्तर के उन राज्यों को सतर्क किया गया है, जहां कुकी विद्रोहियों का वर्चस्व है। म्यांमार सीमा से मणिपुर के पांच जिले चंदेल, टेंग्नौपाल, कामजोंग, उखरूल और चुरचंदपुर लगते हैं। इन जिलों में सबसे अधिक हिंसा हुई। मणिपुर म्यांमार के सागैंग और चिन के साथ 398 किमी सीमा साझा करता है। इससे साफ होता है कि आग भड़काने में सीमा पार से लोगों को मदद मिली।