रामकृपाल सिंह: कोई भी परिवर्तन तब होता है जब विपक्ष एक सकारात्मक नरेटिव गढ़ता है। आजादी के बाद से जितने भी बड़े सत्ता परिवर्तन हुए हैं वो सकारात्मक नरेटिव पर ही हुए हैं। पिछले कुछ वक्त से नरेटिव सकारात्मक की जगह नकारात्मक गढ़े जा रहे हैं। मुझे नहीं लगता है कि नकारात्मक नरेटिव से आप बड़ा बदलाव कर सकते हैं।
पूर्णिमा त्रिपाठी: जो शब्द इस्तेमाल किए गए हैं उसे कोई भी डिफेंड नहीं कर सकता है। किसी के लिए भी इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल बहुत ही शर्मनाक है। जिसने भी इन शब्दों का इस्तेमाल किया है उसके खिलाफ एफआईआर हो गई है। उसके लिए जो भी सजा हो वो होनी चाहिए। जिस व्यक्ति ने ये सब कहा वो न तो वो कांग्रेस का नेता है न ही कोई कार्यकर्ता है। कांग्रेस का कहना है कि वो हमारा कार्यकर्ता नहीं है वो भाजपा का कार्यकर्ता है।
अवधेश कुमार: अगर बुद्धिजीवी और पत्रकारों की ओर से किसी भी स्तर पर इसे जस्टिफाई किया जाएगा तो सोचना होगी कि देश में कितना विषाक्त वायुमंडल लंबे समय से बनाया गया है। ये घटना चूंकि मंच पर आ गया इसलिए हमें ऐसा लग रहा है। मंच से अलग वर्षों से इस तरह की बातें होती रही हैं। आप झूठ फैलाने की कोशिश कर रहे हैं और इस तरह के वातावरण देश में बनाने कोशिश हो रही है उसकी की परिणति आपको बिहार में देखने को मिल रही है।
सुनील शुक्ल: मंच से कोई भी गाली गलौज करने का समर्थन नहीं किया जा सकता है। आप अपने नेता पर गाली पर सवाल उठाएंगे और अपने नेताओं द्वारा विपक्ष के नेता को दी जाने वाली गालियों पर कोई कदम नहीं उठाएंगे तो नैतिकता की बात करना सवालों में आएगा। पारदर्शिता आप नहीं बरतेंगे तो सवाल होंगे। मताधिकार से वंचित कर देना, लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने तो सवाल होंगे। उसका विरोध किया जाना चाहिए। दरभंगा की घटना पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। उस पर सख्त से सख्त कार्रवाई होने दीजिए।
राकेश शुक्ल: करीब दो दशक से ये चर्चा चल रही है। इसमें सबसे बड़ी जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जिसके मंच से ये बात कही गई है। उसे उस व्यक्ति के खिलाफ एफआईआर करानी चाहिए। ये पहल सभी को करनी पड़ेगी। तब आप इस पर नियंत्रण ला सकते हैं। लेकिन एक चलन चल गया है कि कौन किसका कपड़ा कितना फाड़ सकता है। उसी चलन के चलते अब पार्टियों के कार्यकर्ता भी इसमें शामिल हो गए हैं।
विनोद अग्निहोत्री: सीढ़ियों की सफाई हमेशा ऊपर से होती है। ये बात सभी राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है। ये आज की शुरुआत नहीं हुई है। आपातकाल से पहले से इस तरह की भाषा हम सुनते आए हैं। बस ये उस पतन की पराकाष्ठा है। जिस किसी ने ये बयान दिया है उसे सख्त से सख्त सजा होनी चाहिए। सवाल ये है कि बड़े नेता कब चेतेंगे जो अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं पर लगाम लगाएंगे।