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कभी अंग्रेजों का खून सूख जाता था झांसी के नाम से, अब यहां के बच्चों का सूख रहा खून

प्रशांत शर्मा, झांसी Published by: गौरव पाण्डेय Updated Thu, 24 Dec 2020 02:05 AM IST

सार

  • कुपोषण के आगे दम तोड़ रहा है बचपन, हड्डियों के ढांचे में तब्दील हो रहे मासूम
  • हकीकत दावे से कहीं दूर, कुपोषण के खिलाफ अमर उजाला का साझा अभियान
  • खेलने की उम्र में बिस्तर पर पड़े बच्चे, बाल विवाह के कारण बढ़ रही है कुपोषण
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गढ़मऊ गांव निवासी सुलतान की तीन साल की पुत्री स्वीकृति के पैर बेजान हो चुके हैं। इस कारण वह खड़ी नहीं हो पाती - फोटो : अमर उजाला

जिस झांसी की सरजमीं का नाम सुनकर ही कभी अंग्रेजों का खून सूख जाया करता था और यहां के वीरों के आगे वो खड़े नहीं हो पाते थे, आज उसी झांसी की वीरभूमि के नौनिहाल अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे हैं। उनके पैर बेजान हो गए हैं और बच्चों से लेकर महिलाओं तक में खून की बेहद कमी हो गई है। यहां के 40 फीसदी बच्चों में खून की कमी है। यही नहीं इतने ही फीसदी बच्चों को छह महीने तक मां का दूध नहीं मिल पाता है।

कुपोषण दूर करने के लिए सरकारी दावे और वादे जमीनी हकीकत से काफी दूर हैं। खून की कमी और कमजोर शरीर ने बच्चों के चेहरों की रौनक ही उड़ा दी है। न तो उनका खेलने-कूदने में मन लगता है और न ही पढ़ाई-लिखाई में। पैर बेजान होने के कारण बच्चे खड़े नहीं हो पा रहे हैं। बौनेपन की समस्या भी बच्चों में आम हैं। यह हालात झांसी के किसी एक गांव के नहीं, बल्कि हर इलाके के हैं। अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट में कुछ ऐसी स्थिति सामने आई है।



सुलतान की बेटी स्वीकृति तीन साल की होने के बाद भी न ढंग से चल पाती है और न बैठ पाती है। गांव की आदिवासी बस्ती में ज्यादातर बच्चों में खून की कमी है। इसके पीछे का एक कारण बाल विवाह भी है। गांव के सुनील आदिवासी ने बताया कि यहां 14-15 साल की उम्र में विवाह कर दिया जाता है। देवेंद्र भार्गव ने बताया कि गांव में कुपोषण के बढ़ रहे मामलों के बाद भी कोई अधिकारी सर्वे करने नहीं पहुंचा है।

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गढ़मऊ गांव निवासी सुलतान की तीन साल की पुत्री स्वीकृति के पैर बेजान हो चुके हैं। इस कारण वह खड़ी नहीं हो पाती - फोटो : अमर उजाला
जिस झांसी की सरजमीं का नाम सुनकर ही कभी अंग्रेजों का खून सूख जाया करता था और यहां के वीरों के आगे वो खड़े नहीं हो पाते थे, आज उसी झांसी की वीरभूमि के नौनिहाल अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे हैं। उनके पैर बेजान हो गए हैं और बच्चों से लेकर महिलाओं तक में खून की बेहद कमी हो गई है। यहां के 40 फीसदी बच्चों में खून की कमी है। यही नहीं इतने ही फीसदी बच्चों को छह महीने तक मां का दूध नहीं मिल पाता है।

कुपोषण दूर करने के लिए सरकारी दावे और वादे जमीनी हकीकत से काफी दूर हैं। खून की कमी और कमजोर शरीर ने बच्चों के चेहरों की रौनक ही उड़ा दी है। न तो उनका खेलने-कूदने में मन लगता है और न ही पढ़ाई-लिखाई में। पैर बेजान होने के कारण बच्चे खड़े नहीं हो पा रहे हैं। बौनेपन की समस्या भी बच्चों में आम हैं। यह हालात झांसी के किसी एक गांव के नहीं, बल्कि हर इलाके के हैं। अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट में कुछ ऐसी स्थिति सामने आई है।

सुलतान की बेटी स्वीकृति तीन साल की होने के बाद भी न ढंग से चल पाती है और न बैठ पाती है। गांव की आदिवासी बस्ती में ज्यादातर बच्चों में खून की कमी है। इसके पीछे का एक कारण बाल विवाह भी है। गांव के सुनील आदिवासी ने बताया कि यहां 14-15 साल की उम्र में विवाह कर दिया जाता है। देवेंद्र भार्गव ने बताया कि गांव में कुपोषण के बढ़ रहे मामलों के बाद भी कोई अधिकारी सर्वे करने नहीं पहुंचा है।

खेलने की उम्र में बिस्तर पर पड़े बच्चे, बाल विवाह से बढ़ रहा कुपोषण

गढ़मऊ गांव में कुपोषण के कारण चलने-फिरने में असमर्थ पांच साल के इंदर को गोद में लेकर बैठी दादी सुखदेवी - फोटो : अमर उजाला
गढ़मऊ गांव में पांच साल का इंदर चलने-फिरने में पूरी तरह असमर्थ है। उसको देखकर लगता है कि वह अभी एक वर्ष का ही है। दादी सुखदेवी ने बताया कि कुपोषण के शिकार इंदर की आंखें पूरी तरह अंदर धंस गई हैं। हाथ-पैर बेजान से तो हैं ही यहां तक कि रोने पर आवाज भी बेहद धीमी निकलती है। 
 

कुपोषित पैदा होते हैं अधिकांश बच्चे और लोगों को जानकारी ही नहीं

लक्ष्मनपुरा गांव की ममता अपने बेटे पंकज के कुपोषित होने की वजह से शरीर दुबला होने और उम्र के हिसाब से कद न बढ़ने से चिंतिंत हैं - फोटो : अमर उजाला
लक्ष्मनपुरा गांव के सहारिया बस्ती में अमर उजाला की टीम पहुंची। बस्ती में रहने वाले कई बच्चे कुपोषित दिखे। इन बच्चों के परिजनों से जब बात की तो पता चला कि उनको कुपोषण के बारे में कोई जानकारी ही नहीं है। गांव के अधिकांश जरूरतमंद बच्चों और महिलाओं को वक्त पर न पुष्टाहार मिला और न आंगनबाड़ी केंद्र पर कोई जांच हुई। 

गांव की ही ममता जरूर अपने बच्चे के कद को लेकर चिंतित दिखीं। उन्होंने कहा कि बेटा पंकज पांच साल को हो गया है लेकिन उसका कद अभी दो फुट ही है। ममता ने कहा कि उनके बच्चे को देखने कोई भी स्वास्थ्य कर्मचारी नहीं पहुंचा। गांव के मुलायम सिंह यादव ने बताया कि कुपोषण से बच्चों और महिलाओं की हालत बहुत खराब है।

झांसी में मिसाल बना दिगारा का आंगनबाड़ी केंद्र

दिगारा आंगनवाड़ी केंद्र में बच्चों के अभिभावकों को पोषण संबंधी जानकारी देतीं आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रेखा यादव - फोटो : अमर उजाला
कुपोषण को लेकर तमाम तरह की दुश्वारियों के बावजूद दिगारा का आंगनबाड़ी केंद्र झांसी में मिसाल बन गया है। सात महीने में यहां अतिकुपोषित बच्चों की संख्या चार से घटकर शून्य हो गई है। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रेखा यादव ने बताया कि लॉकडाउन को उन्होंने अवसर में बदला और घर-घर जाकर सर्वे किया। कुपोषित बच्चा मिला तो उसके परिजनों को पर्चे छपवाकर डाइट चार्ट दिया। पहले स्कूल से पंजीरी और खाना बनकर आता था। 

अब सरकार प्रति बच्चा एक माह के लिए एक किलो चावल, डेढ़ किलो गेहूं और 750 ग्राम दाल दे रही है। इससे बच्चों की सेहत में सुधार आया है। केंद्र में पोषण वाटिका बनाकर दूसरों को भी घर में बनाने के लिए प्रेरित किया। अब तक 119 घरों में 15 लोग अपने यहां वाटिका बना चुके हैं। केंद्र में पहले कुपोषित बच्चे रहे शरद की मां ने बताया कि डाइट चार्ट का पालन करने से बेटे की स्थिति सुधरी। कुपोषण से छुटकारा पाने के बाद अब बच्चा पहले जैसा सुस्त नहीं रहा।

मगर सरकारी आंकड़े सुधर रहे

दिगारा आंगनबाड़ी केंद्र में बनी पोषण वाटिका - फोटो : अमर उजाला
वर्ष अल्प वजन गंभीर अल्प वजन
2018 15,637 6824
2019 16,828 5715
2020 14,369 4208

(शून्य से पांच साल तक के बच्चों की स्थिति)

 

झांसी में ये हैं हालात

  • 40 फीसदी बच्चों में खून की कमी, 15 फीसदी गंभीर कमी
  • मेडिकल कॉलेज में हर माह 30 बच्चों को चढ़ता है रक्त
  • 40 प्रतिशत को छह माह तक मां का दूध नहीं मिलता
  • छह महीने बाद 30 फीसदी को अर्द्ध ठोस आहार नहीं मिलता

पांच साल में दो हजार बच्चे हुए स्वस्थ

महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के कुपोषण निदान केंद्र में पिछले पांच सालों में दो हजार बच्चों को स्वस्थ करके डिस्चार्ज किया जा चुका है। पांच साल से कम उम्र के बच्चे का वजन और ऊंचाई नहीं बढ़ रही हो, पूरे शरीर में सूजन आ रही हो या फिर छह महीने से कम उम्र के बच्चे का वजन न बढ़ रहा हो तो परिजन उसे कुपोषण निदान केंद्र में लेकर आएं। यहां 14 दिन तक बच्चे को भर्ती कर 15 फीसदी वजन बढ़ाकर भेजने का प्रयास करते हैं। सबकुछ निशुल्क है। 
-डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज, झांसी
 
स्वास्थ्य, पूर्ति, पंचायती राज विभाग आपसी तालमेल से बेहतर काम कर रहे हैं। लाभार्थियों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। कुपोषित बच्चों की मैपिंग कर सेहत सुधारी जा रही है। जिले में कुपोषण के आंकड़े भी सुधर रहे हैं। 
-नरेंद्र सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी
 
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की तरफ से टीकाकरण समेत विटामिन टैबलेट का वितरण लगातार किया जा रहा है। कुपोषित बच्चों की सेहत सुधारने के लिए स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से प्रयासरत है। इसी कारण झांसी में हालात सुधर भी रहे हैं। 
-डॉ. वीके सिन्हा, अपर निदेशक स्वास्थ्य
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