जिस झांसी की सरजमीं का नाम सुनकर ही कभी अंग्रेजों का खून सूख जाया करता था और यहां के वीरों के आगे वो खड़े नहीं हो पाते थे, आज उसी झांसी की वीरभूमि के नौनिहाल अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत नहीं दिखा पा रहे हैं। उनके पैर बेजान हो गए हैं और बच्चों से लेकर महिलाओं तक में खून की बेहद कमी हो गई है। यहां के 40 फीसदी बच्चों में खून की कमी है। यही नहीं इतने ही फीसदी बच्चों को छह महीने तक मां का दूध नहीं मिल पाता है।
कुपोषण दूर करने के लिए सरकारी दावे और वादे जमीनी हकीकत से काफी दूर हैं। खून की कमी और कमजोर शरीर ने बच्चों के चेहरों की रौनक ही उड़ा दी है। न तो उनका खेलने-कूदने में मन लगता है और न ही पढ़ाई-लिखाई में। पैर बेजान होने के कारण बच्चे खड़े नहीं हो पा रहे हैं। बौनेपन की समस्या भी बच्चों में आम हैं। यह हालात झांसी के किसी एक गांव के नहीं, बल्कि हर इलाके के हैं। अमर उजाला की ग्राउंड रिपोर्ट में कुछ ऐसी स्थिति सामने आई है।
| वर्ष | अल्प वजन | गंभीर अल्प वजन |
| 2018 | 15,637 | 6824 |
| 2019 | 16,828 | 5715 |
| 2020 | 14,369 | 4208 |
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के कुपोषण निदान केंद्र में पिछले पांच सालों में दो हजार बच्चों को स्वस्थ करके डिस्चार्ज किया जा चुका है। पांच साल से कम उम्र के बच्चे का वजन और ऊंचाई नहीं बढ़ रही हो, पूरे शरीर में सूजन आ रही हो या फिर छह महीने से कम उम्र के बच्चे का वजन न बढ़ रहा हो तो परिजन उसे कुपोषण निदान केंद्र में लेकर आएं। यहां 14 दिन तक बच्चे को भर्ती कर 15 फीसदी वजन बढ़ाकर भेजने का प्रयास करते हैं। सबकुछ निशुल्क है।
-डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष, मेडिकल कॉलेज, झांसी
स्वास्थ्य, पूर्ति, पंचायती राज विभाग आपसी तालमेल से बेहतर काम कर रहे हैं। लाभार्थियों को सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है। कुपोषित बच्चों की मैपिंग कर सेहत सुधारी जा रही है। जिले में कुपोषण के आंकड़े भी सुधर रहे हैं।
-नरेंद्र सिंह, जिला कार्यक्रम अधिकारी
स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की तरफ से टीकाकरण समेत विटामिन टैबलेट का वितरण लगातार किया जा रहा है। कुपोषित बच्चों की सेहत सुधारने के लिए स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से प्रयासरत है। इसी कारण झांसी में हालात सुधर भी रहे हैं।
-डॉ. वीके सिन्हा, अपर निदेशक स्वास्थ्य