बच्चों के पोषण और सेहत में सुधार के मकसद से बने आंगनवाड़ी केंद्र की खुद की सेहत बिगड़ रही है। फंड और स्टाफ की कमी की वजह आंगनवाड़ियां टूट रही हैं। स्टाफ की कमी का असर बच्चों की देखभाल पर भी पड़ता है।
लिहाजा, कुपोषण और ऐनेमिया की बीमारी बच्चों में बढ़ रही है। आंगनवाड़ियों से ही सेवा लेने वाले 28 फीसदी बच्चे कुपोषित पाए गए हैं। बिहार के बाद उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में कुपोषण का स्तर सबसे ज्यादा है।
हरियाणा, हिमाचल और उत्तराखंड में भी खतरा बरकरार है। देश के आंगनवाड़ी केंद्रों में 31 फीसदी बाल विकास प्रोजेक्ट अधिकारी और 30 फीसदी सुपरवाइजरों के पद खाली पड़े हैं।
सबसे ज्यादा हिमाचल 57 और उत्तर प्रदेश में 40 फीसदी सुपरवाइजर के पद खाली पड़े हैं। देशभर में सात फीसदी आंगनवाड़ी कार्यकर्त्ताओं की कमी है। छत्तीसगढ़ में सबसे ज्यादा 24 फीसदी कार्यकर्त्ताओं की कमी है।
गैर सरकारी संगठन एकाउंटएबिलिटी इनीशेटिव की 2015-16 रिपोर्ट महिला बाल विकास मंत्रालय की ओर से चलाई जा रही एकीकृत बाल विकास सेवाएं यानी आईसीडीएस योजना की बिगड़ती तस्वीर पेश करती है।
संगठन का कहना है कि वित्तीय वर्ष 2016-17 की शुरुआत में सरकार ने आईसीडीएस के लिए 14 हजार करोड़ रूपए आवंटित किए थे जो पिछली बार से 10 फीसदी कम है।
साथ ही 2015 में सरकार की फंड देने की प्रक्रिया बेहद धीमी थी। सितंबर 2015 तक आईसीडीएस का सिर्फ 30 फीसदी फंड ही हिमाचल और जम्मू कश्मीर के लिए जारी हुआ था।
उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में कुपोषण का स्तर मामूली रूप से गिरा है। 2011 में 35 फीसदी और 2014 में 41 फीसदी कुपोषण का स्तर रहा। हिमाचल प्रदेश में 20, हरियाणा में 28 और उत्तराखंड में 10 फीसदी कुपोषण का स्तर पाया गया।
चंडीगढ़ की 500 आंगनवाड़ी केवल 9 सुपरवाइजर्स के भरोसे चल रही हैं। जबकि हर 25 आंगनवाड़ी पर 1 सुपरवाइजर का होना जरूरी है। वहीं समूचे पंजाब में भी हालत खराब है।
आंगनवाड़ी मुलाजिम यूनियन पंजाब की वित्त सचिव तथा जिला प्रधान सुभाष रानी ने बताया कि आंगनवाड़ी में बहुत से पोस्ट खाली पड़ी हैं। महज पांच हजार वेतन में गुजारा कर रहे हैं।
सरकार की ओर से किसी भी तरह की सुविधा मुहिया नहीं करवाई जा रही है। बिजली, रजिस्टर, फर्नीचर, खाने का सामान सभी खर्च अपनी तरफ से ही उठाना पड़ता है।
ब्लाक खन्ना की सीडीपीओ सरबजीत कौर ने बताया कि हर एक आंगनबाडी सेंटर में एक वर्कर व एक हैल्पर मौजूद है जो कि काफी नहीं हैं। वर्कर को पांच हजार व हैल्पर को 2500 रुपये दिए जा रहे हैं जो बहुत कम है। कई जगह आंगनवाड़ी केंद्र छप्पर में चलने को मजबूर है तो कुछ खुले में ही चल रहे हैं। केंद्र कुछ जगह प्राइमरी स्कूल में चल रहे हैं।