केरल के समुद्र तटों से महज एक घंटे की हवाई दूरी पर स्थित मालदीव के अंदरुनी हालात ने नई परेशानी खड़ी कर दी है। इसे भारत के लिए कूटनीति के दंगल में नई चुनौती माना जा रहा है। विदेश मंत्रालय मालदीव के घटनाक्रम में भारत के कदम को लेकर फिलहाल कोई भी बयान देने से बच रहा है, लेकिन सूत्र बताते हैं कि शीर्ष स्तर काफी कुछ चल रहा है। मालदीव ने कहा कि उसने तीन देशों में अपने विशेष दूत भेजने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन भारत ने इसे खारिज कर दिया है।
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मालदीव की तरफ से कहा गया है कि विशेष दूत के प्रस्ताव को भारत ने विदेश मंत्री और प्रधानमंत्री के व्यस्त कार्यक्रम का हवाला देकर खारिज किया है। मालदीव का यह बयान मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति द्वारा वहां के अंदरुनी हालात तथा प्रजातंत्र पर मंडराते खतरे के बाबत भारत से हस्तक्षेप करने के बाद आया है। वहीं भारतीय कूटनीतिक गलियारे में भारत की इस पहल को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। यह मालदीव के ऊपर कूटनीतिक दबाव के तौर पर देखा जा रहा है। इस बारे में भी विदेश मंत्रालय ने अभी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।
मालदीव के अंदरुनी हालात के बिगड़ने, वहां आपातकाल लागू होने के पीछे चीन की भूमिका काफी अहम बताई जा रही है। चीन के कारोबारियों के वहां होटल हैं। व्यवसायिक स्तर पर भी चीन के लोगों ने बड़े पैमाने पर निवेश किया जाता है और माना जाता है कि चीन का दखल लगातार बढ़ रहा है। मालदीव के माराओ द्वीप पर चीन पनडुब्बी का ठिकाना बनाना चाहता है। वह वहां स्थाई सैन्य अड्डा बनाने की फिराक में है और इसके लिए पाकिस्तान भी चीन का सहयोगी है।
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सूत्र बताते हैं कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की मदद से वहां की जमीन से संचालित आतंकी संगठन लश्करे तोइबा (जमात-उद् दावा) भी कट्टरपंथियों में अपनी जड़े जमा रहा है। कूटनीतिक हलके में भी यह चर्चा आम है कि चीन अपनी रिंग ऑफ पर्ल (मोतियों का हार) योजना के तहत वहां से भारत की जड़े कमजोर करने में लगातार लगा हुआ है।
रिंग ऑफ पर्ल (मोतियों का हार)
Maldives Army on High Alert
रिंग ऑफ पर्ल (मोतियों का हार)
मोतियों का हार चीन की गुप्त योजनाओं में से है। जिसका मकसद स्ट्रेट ऑफ हार्मुज से लेकर हिन्द महासागर क्षेत्र में उसे भविष्य में चुनौती देने में सक्षम भारत के चारों तरफ घेरा बढ़ाना है। इसी इरादे से चीन की कंपनियों ने श्रीलंका के हंबन टोटा बंदरगाह तक पहुंच बनाई है और पड़ोसी देश तक उसकी आवाजाही बढ़ गई है। इसी उद्देश्य से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को विकसित करके पाक अधिकृत कश्मीर के रास्ते चीन सिल्क रुट परियोजना पर काम कर रहा है।
बांग्लादेश के चट्गाव, सिंगापुर के पास सेतुवे समेत अन्य क्षेत्रों में उसकी कोशिश जारी है। वह जमीन के रास्ते से भी भारत को चारों तरफ से घेरने में लगा है। नेपाल में भारत नेपाल-सीमा तक पहुंच बनाने की चीन की महत्वाकांक्षी योजना है।
क्यों है मालदीव अहम?
MALDIVES_EMERGENCY_PLACED
- फोटो : self
क्यों है मालदीव अहम?
-मालदीव भारत की समुद्री सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम है। हिन्द महासागर में केरल के तटों से कोई 500 किमी और केरल के कोच्चि हवाई अड्डे से लगभग 600 किमी दूर मालदीव को भारत की धड़कन कहा जा सकता है। हवाई रास्ते करीब 380 मील की इस दूरी को सवा घंटे में तय किया जा सकता है। मालदीव की भौगोलिक स्थिति जहां है उस क्षेत्र से दुनिया का करीब समुद्री व्यापार का रास्ता गुजरता है। 70 चीन के होने वाले निर्यात के रूट पर पड़ता है। इस तरह से हिन्द महासागर में वह भारत की सुरक्षा के लिहाज से सामरिक क्षेत्र में स्थित है।
-पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने 26 नवंबर 2008 को मुंबई में दुनिया को दहला देने वाला आतंकी हमला किया था। माना जा रहा है कि मालदीव में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों की पैठ बढऩे पर वह इसके द्वीपों पर अपना अड्डा बना सकते हैं। वह वहां हथियार जमा करके माकूल समय के हिसाब समुद्री रास्ते से केरल, अथवा मुंबई या तटीय शहर में दाखिल हो सकते हैं।
-मालदीव में चीन जैसे देश का दबदबा बढ़ने, सैन्य आवाजाही के बाद तनाव बढ़ने की दशा में चीन यहां से भारत के क्षेत्र में आसानी से प्रवेश कर सकता है। भारत पर समुद्री क्षेत्र की चिंता का दबाव बढ़ा सकता है।
-हिन्द महासागर में भारतीय नौसेना के साथ अन्य देशों के होने वाले नौसैनिक अभ्यासों में भी किंतु परंतु की स्थिति ला सकता है।
इस रास्ते से अमेरिका का भी व्यापार होता है। एशियाई देशों और अन्य के आयात-निर्यात का रूट है। इसलिए मालदीव में चीन के बढ़ रहे प्रभाव को लेकर अमेरिका, कनाडा, चीन, यूरोपीय देश भी चिंतित है। यही वजह है कि वहां संवैधानिक संकट गहराने, प्रजातंत्र के खतरे में पड़ने की संभावना तथा आपातकाल लागू होने के बाद से अमेरिका मालदीव को लगातार अपना संदेश दे रहा है। अमेरिका समेत दुनिया के देश मालदीव की ताजा स्थिति को चीन की गुप्त चाल से भी जोड़कर देख रहे हैं। इसके पीछे माना जा रहा है कि दक्षिण चीन सागर को लगातार संवेदनशील है। इसलिए मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन के कंधे पर हाथ रखकर आगे बढ़ रहा है।
क्या चाहता है भारत?
प्रजातंत्र के मूल्य में विश्वास करने वाला भारत सदेव पड़ोसियों के सहअस्तित्व की नीति पर चला है। पंचशील के सिद्धांत भी इसी की व्याख्या करते हैं। ऐसे में भारत चाहता है कि मालदीव की राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन की सरकार कानून, परंपरा और प्रजातंत्र के मूल्य का स्वागत करे। देश के संविधान संवत कार्य करे। आपातकाल खत्म हो, विपक्ष के नेताओं को रिहा करने के साथ-साथ इस साल के अंत में होने वाले आम चुनाव की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।
क्या हैं भारत के विकल्प?
कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव के जरिए मालदीव में शांति, सौहार्द और प्रजातंत्र की बहाली की दिशा में सफलता के प्रयास, माना जा रहा है कि भारत अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों के संपर्क में है। इसके लिए कूटनीतिक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। इसी के साथ-साथ भारत और अमेरिका जैसे देश मालदीव में चीन के दखल समेत अन्य विकल्पों का भी आकलन कर रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि भारत मालदीव में सामान्य स्थिति की बहाली के लिए हस्तक्षेप समेत तमाम उपायों पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसलिए उसकी सभी घटनाक्रमों पर नजर है। इसलिए अभी देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व शांत है और विदेश मंत्रालय पूरी तरह शब्दों को तौल कर अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है।