फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

Sita Shelke: वायनाड में जारी बचाव कार्य के बीच चर्चा में मेजर सीता, कैसे बिना रुके 31 घंटे में बनवाया पुल?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: शिवेंद्र तिवारी Updated Sat, 03 Aug 2024 07:03 PM IST

सार

Sita Shelke: भारतीय सेना ने भूस्खलनों से तबाह हुए वायनाड के दो गांवों चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच संपर्क बहाल करने के लिए 190 फीट लंबा बेली ब्रिज बनाया है। सेना ने यह पुल बिना रुके 31 घंटे काम करने के बाद बनाया गया है। जिस टीम ने इस पुल को बनाया है उसमें मेजर सीता शेल्के की भी अहम भूमिका रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन
वायनाड में भूस्खलन के बाद बचाव और राहत कार्य में लगीं मेजर सीता शेल्के - फोटो : AMAR UJALA
पिछले दिनों केरल के वायनाड में आई आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया। त्रासदी ऐसी कि घटना के चार दिन बीते जाने के बाद भी बचाव और राहत कार्य पूरा नहीं किया जा सका है। भूस्खलन के कारण आई आपदा में तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। आपदा के बाद सेना, राज्य पुलिस और एनडीआरएफ की टीमें दिन रात लोगों को बचाने के लिए अभियान चला रही हैं।

घटना के बाद बचाव और राहत कार्य के लिए सबसे बड़ी समस्या थी संपर्क पुल की जो आपदा में नष्ट हो गई। हालांकि, भारतीय सेना ने 31 घंटे बिना रुके 190 फीट ऊंचा बेली ब्रिज तैयार कर दिया और इसके कारण कई लोगों की जान बचाई गई है। जिस टीम ने इस पुल को बनाया उसमें मेजर सीता अशोक शेल्के ने भी अहम भूमिका निभाई है। शेल्के की अब सोशल मीडिया पर लोग जमकर तारीफ कर रहे हैं। मशहूर उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी मेजर सीता की सराहना की है। 


आइये जानते हैं वायनाड में त्रासदी के बाद कैसे हुआ राहत कार्य? पुल बनाने वाली मेजर सीता कौन हैं? उनकी टीम ने कैसे पुल बनाया है? पुल बनाना क्यों अहम था? इससे राहत कार्य में कैसे आसानी हुई? 
विज्ञापन

वायनाड में भूस्खलन के बाद बचाव और राहत कार्य में लगीं मेजर सीता शेल्के - फोटो : AMAR UJALA
पिछले दिनों केरल के वायनाड में आई आपदा ने पूरे देश को झकझोर दिया। त्रासदी ऐसी कि घटना के चार दिन बीते जाने के बाद भी बचाव और राहत कार्य पूरा नहीं किया जा सका है। भूस्खलन के कारण आई आपदा में तीन सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। आपदा के बाद सेना, राज्य पुलिस और एनडीआरएफ की टीमें दिन रात लोगों को बचाने के लिए अभियान चला रही हैं।

घटना के बाद बचाव और राहत कार्य के लिए सबसे बड़ी समस्या थी संपर्क पुल की जो आपदा में नष्ट हो गई। हालांकि, भारतीय सेना ने 31 घंटे बिना रुके 190 फीट ऊंचा बेली ब्रिज तैयार कर दिया और इसके कारण कई लोगों की जान बचाई गई है। जिस टीम ने इस पुल को बनाया उसमें मेजर सीता अशोक शेल्के ने भी अहम भूमिका निभाई है। शेल्के की अब सोशल मीडिया पर लोग जमकर तारीफ कर रहे हैं। मशहूर उद्योगपति आनंद महिंद्रा ने भी मेजर सीता की सराहना की है। 

आइये जानते हैं वायनाड में त्रासदी के बाद कैसे हुआ राहत कार्य? पुल बनाने वाली मेजर सीता कौन हैं? उनकी टीम ने कैसे पुल बनाया है? पुल बनाना क्यों अहम था? इससे राहत कार्य में कैसे आसानी हुई? 

वायनाड में भूस्खलन - फोटो : AMAR UJALA
पहले जानते हैं कि वायनाड में क्या घटना घटी ?
30 जुलाई की सुबह वायनाड जिले के मेप्पाडी के पास पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन की तीन बड़ी घटनाएं हुईं। मेप्पाडी, मुंडक्कई टाउन और चूरलमाला में बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ। पहला भूस्खलन भारी बारिश के दौरान रात करीब एक बजे मुंडक्कई टाउन में हुआ। बचाव अभियान अभी चल ही रहा था कि चूरलमाला स्कूल के पास सुबह करीब चार बजे दूसरा भूस्खलन हुआ। इसके चलते स्कूल और आसपास के घरों और दुकानों में पानी और कीचड़ भर गया। भूस्खलन के चलते आए पानी के तेज बहाव ने मेप्पाडी, मुंडक्कई टाउन और चूरलमाला में भीषण तबाही मचाई। इससे दो गांवों चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच संपर्क भी टूट गया। पहाड़ियों से आए बड़े-बड़े पत्थरों ने 100 फीट लंबे कंक्रीट के पुल को नष्ट कर दिया।

आपदा के 13 घंटे बाद एनडीआरएफ और सेना के जवानों की एक टीम नदी पार कर मुंडक्कई पहुंची। मुंडक्कई, चूरलमाला से 3.5 किलोमीटर दूर है।  

भूस्खलन की घटना ने 300 से ज्यादा लोगों की जान ले ली है। सैकड़ों लोग इस आपदा में घायल हुए हैं और उनका अस्पतालों में इलाज चल रहा है। वहीं अभी करीब 300 लोग लापता भी हैं। केरल के मुख्यमंत्री विजयन ने कहा कि हमने अभी तक 148 शव बरामद किए हैं। 10,042 लोग 93 राहत कैंपों में रह रहे हैं। अभी भी चलियार नदी और भूस्खलन प्रभावित इलाकों में तलाशी अभियान चल रहा है। रेस्क्यू अभियान में 1,419 लोग लगे हुए हैं। ड्रोन आधारित रडार जल्द ही तैनात किए जाएंगे। वायनाड को फिर से अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए केरल के लोग एकजुट हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि 67 शव ऐसे हैं, जिनकी अभी तक पहचान नहीं हो पाई है। 

वायनाड में भूस्खलन के बाद बचाव और राहत कार्य में लगीं मेजर सीता शेल्के - फोटो : PTI
घटना के बाद कैसे हुआ राहत कार्य?
भूस्खलन से आई तबाही को कम करने और जिंदा बचे लोगों को बचाने के बीच एक पुल का फैसला था। चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच संपर्क बहाल करने के लिए बेली ब्रिज का काम भारतीय सेना ने अपने जिम्मे लिया। स्थानीय अखबार मनोरमा की रिपोर्ट के अनुसार, बेली ब्रिज के लिए 10-10 फीट लंबे पैनल मंगलवार (30 जुलाई) को 20 ट्रकों में बेंगलुरु से चूरलमाला भेजे गए थे, उसी दिन वायनाड में भूस्खलन हुआ था। 30 जुलाई की शाम को सेना के इंजीनियरिंग टास्क फोर्स मद्रास इंजीनियर ग्रुप के अधिकारियों ने इस जगह का मुआयना किया। वहीं  31 जुलाई को सुबह नौ बजे मद्रास इंजीनियर ग्रुप के 144 अधिकारियों ने पुल पर काम शुरू कर दिया। पुल के मुहाने पर जगह कम थी जिसकी वजह से काम की गति में बाधा आ रही थी। मौसम और पर्याप्त जगह की कमी ने पुल के निर्माण को एक चुनौतीपूर्ण कार्य बना दिया। इन सबके बावजूद, सेना के अधिकारी रात भर बिना रुके काम करते रहे, केवल पुल बनाने के लिए भोजन करने के लिए रुके। काम शुरू होने के 31 घंटे बाद 1 अगस्त को शाम छह बजे पुल बनकर तैयार हो गया।

वायनाड में भूस्खलन के बाद बचाव और राहत कार्य - फोटो : PTI
31 घंटे काम करने के बाद 190 फीट लंबा बेली ब्रिज बनाया
1 अगस्त को सुबह करीब तीन बजे सेना के जवानों ने बेली ब्रिज के समानांतर एक और 100 फीट लंबे फुटब्रिज पर भी काम शुरू किया। इसे सुबह छह बजे तक पूरा कर लिया। फुटब्रिज राहत बचाव में लगी टीमों और आवश्यक समान की आपूर्ति करने वालों के लिए पूरे दिन मुंडक्कई तक पहुंचने के लिए एक वरदान साबित हुई।

बिना रुके 31 घंटे काम करने के बाद, भारतीय सेना ने कई भूस्खलनों से तबाह हुए वायनाड के दो गांवों चूरलमाला और मुंडक्कई के बीच संपर्क बहाल करने के लिए 190 फीट लंबा बेली ब्रिज बनाया। सेना ने पहले एक एम्बुलेंस को गुजरने दिया और फिर सेना के ट्रक को पुल पर चलाया गया। बताया गया कि तीन मीटर चौड़ा यह पुल 24 टन वजन उठा सकता है और मुंडक्कई में बचाव अभियान में तेजी ला सकता है। सेना के एक मेजर ने बताया कि मुंडक्कई तक मिट्टी हटाने वाली मशीनें, खुदाई करने वाली मशीनें, ट्रक, एंबुलेंस और जीपें ले जाने के लिए यह चौड़ाई काफी है। अब तक, केवल ऑफ-रोड जीपें ही राहत और बचाव स्थलों तक खाद्य सामग्री, लोगों और औजारों को ले जा रही थीं। मेजर ने कहा कि दोनों पुल तब तक जनता के लिए उपलब्ध रहेंगे जब तक कि नया कंक्रीट पुल नहीं बन जाता या जब तक सरकार चाहे। 

वायनाड में भूस्खलन के बाद बचाव और राहत कार्य - फोटो : PTI
ब्रिज बनाने में मेजर सीता की क्या भूमिका रही?
आपदा के समय वरदान बनी बेली पुल के निर्माण के पीछे भारतीय सेना का इंजीनियरिंग टास्क फोर्स मद्रास इंजीनियर ग्रुप था। इस काम में मद्रास इंजीनियर ग्रुप (एमईजी) एवं सेंटर, बेंगलुरु की महिला सेना इंजीनियर मेजर सीता अशोक शेल्के ने अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, मेजर सीता ने स्थानीय निवासियों और अधिकारियों से मिले सहयोग की सराहना की है। 35 वर्षीय मेजर ने मनोरमा अखबार को बताया कि उनका एकमात्र लक्ष्य पुल को जल्द से जल्द पूरा करना था। बहुत सारी चुनौतियां थीं। हमें आकस्मिकताओं से निपटने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। 

मेजर सीता महाराष्ट्र के अहमदनगर के गडिलगांव गांव की रहने वाली हैं। सीता हमेशा से ही सैनिक बनना चाहती थीं और उन्होंने सेना में करियर बनाने के लिए स्नातक की पढ़ाई के लिए मैकेनिकल इंजीनियरिंग को चुना। सीता ने अपने तीसरे प्रयास में एसएसबी परीक्षा पास की थी। उनकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई 2015 में काम आई, जब वह जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 1-ए पर असाइनमेंट के लिए तैनात टीम का हिस्सा थीं। यह राजमार्ग एक बड़े भूस्खलन के बाद अवरुद्ध हो गया था।

वायनाड में भूस्खलन के बाद बचाव और राहत कार्य - फोटो : PTI
कोई भी आराम करने या कपड़े बदलने नहीं गया
वायनाड में पूरी टीम ने 48 घंटे तक लगातार काम किया और मुश्किल से तीन मिनट से ज्यादा का ब्रेक लिया। सीता ने कहा, 'हम नुकसान और तकलीफ देख रहे थे और हम आराम नहीं कर सकते थे। हमारे सेना के जवान पहले से ही प्रेरित हैं और हम उन्हें प्रोत्साहित करते रहते हैं और उन्हें भाई कहते हैं।'

मेजर ने बताया, 'काम सुबह छह बजे से ही शुरू हो जाता था। काम जारी रखने के लिए टीम ने सभी विपरीत परिस्थितियों को सहन किया। सीता ने कहा, 'टीम ने कोई समयसीमा तय नहीं की है। हमारा ध्यान जल्द से जल्द काम पूरा करने पर है। हममें से कोई भी आराम करने या कपड़े बदलने के लिए कमरे में नहीं गया। हमारे लड़के 48 घंटे तक उस बारिश में कड़ी मेहनत कर रहे थे और हम उनके साथ थे।'
 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next