महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर भाजपा को उलझाने वाली शिवसेना अब खुद अपने बुने जाल में उलझ कर रह गई है। मुख्यमंत्री पद को प्रतिष्ठा का सवाल बनाने वाली शिवसेना अब तय नहीं कर पा रही है कि वह शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी से समर्थन ले या फिर भाजपा के उपमुख्यमंत्री पद के प्रस्ताव को स्वीकार करे।
नई सरकार के गठन को लेकर शिवसेना को अपना रुख साफ करना जरूरी है। उसे यह तय करना होगा कि नई परिस्थिति में वह फिर से भाजपा के साथ रहेगी या फिर एनसीपी-कांग्रेस को सत्ता के लिए नया साथी बनाएगी। मुश्किल यह है कि भाजपा शिवसेना को साथ लाने के लिए कोई सम्मानजनक रास्ता भी नहीं दे रही। भाजपा पर ताबड़तोड़ आक्रमण के बाद उसे ही गले लगाना और उप मुख्यमंत्री पद का प्रस्ताव मान लेने से शिवसेना की किरकिरी होगी, जबकि एनसीपी-कांग्रेस के साथ जाने की स्थिति में उस पर हिंदुत्व की राजनीति को कमजोर करने का आरोप लगेगा।
राज्य में जारी सत्ता संग्राम में अगले 48 घंटे बेहद अहम हैं। राज्य के विधानसभा का कार्यकाल 8 नवंबर को खत्म हो रहा है। ऐसे में शिवसेना के समक्ष रुख साफ करने के लिए अब महज 48 घंटे बचे हैं। जहां तक भाजपा का सवाल है तो शिवसेना और एनसीपी के साथ आने पर सहमति न बनने की स्थिति में पार्टी पिछली बार की तरह अल्पमत सरकार बना सकती है। वैसे भी भाजपा सूबे में किसी भी स्थिति में राष्ट्रपति शासन नहीं लगने देना चाहती।