महाराष्ट्र के स्कूलों में हिंदी भाषा से जुड़े सरकारी आदेश (जीआर) को वापस लेने के बाद विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी एकजुट हो गया है। आदेश वापस होने को विपक्षी दलों ने बड़ी जीत बताया है। इसे लेकर शिवसेना (यूबीटी) के प्रमुख उद्धव ठाकरे ने विजय रैली निकालने का एलान किया है। ठाकरे ने कहा कि पांच जुलाई को विजय रैली निकाली जाएगी। वहीं एनसीपी (शरद) के नेता रोहित पवार ने आदेश वापस होने को राज और उद्धव ठाकरे के विरोध का असर बताया है।
शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा कि मैं उन राजनीतिक दलों की सराहना करता हूं जो अलग-अलग रुख के बावजूद इस मुद्दे पर हमारे साथ आए। सरकार ने अस्थायी रूप से सरकारी आदेश (जीआर) को रद्द कर दिया है। अगर सरकार ने इसे रद्द नहीं किया होता, तो हम पांच जुलाई को विरोध प्रदर्शन करते।
उन्होंने कहा कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार की एनसीपी के कई नेता हमारे साथ शामिल होने जा रहे हैं। हम पांच जुलाई को एक विजय रैली निकालेंगे। हमने मराठी नफरत करने वालों को मुक्का मारा है, यह एकता ऐसे ही बनी रहनी चाहिए। भाषा नीति को लेकर डॉ. नरेंद्र जाधव के नेतृत्व में एक नई समिति रिपोर्ट देगी। सरकार ने शिक्षा क्षेत्र के फैसले के लिए वित्तीय विशेषज्ञों को नियुक्त किया है।
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ठाकरे बंधुओं के कारण यह संभव हुआ
एनसीपी-एससीपी नेता रोहित पवार ने कहा कि राज्य सरकार को दिल्ली से सरकारी आदेश (जीआर) लागू करने का आदेश मिला था, इसलिए उन्होंने ऐसा किया। हमारा मानना है कि प्राथमिक शिक्षा में मराठी भाषा पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। हम हिंदी के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन इसे जबरदस्ती थोपा गया।
उन्होंने काहा कि राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे ने इस कदम के खिलाफ पांच जुलाई को एक बड़ी रैली करने का फैसला किया। हमने इस रैली का समर्थन किया। राज्य सरकार ने सरकारी आदेश (जीआर) वापस लेने का फैसला किया। यह दोनों भाइयों उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के कारण संभव हुआ। उनको पांच जुलाई को एक बड़ी रैली, एक विजय रैली आयोजित करनी चाहिए।
शिवसेना (यूबीटी) नेता अंबादास दानवे ने कहा कि जब मराठी लोग एकजुट हुए, तो उनके दबाव के कारण सरकार ने यह फैसला वापस ले लिया। ठाकरे बंधु भी इस मुद्दे पर एक साथ आए हैं, लेकिन मराठी लोगों की एकता के कारण सरकार को इसे वापस लेना पड़ा। एनसीपी-एससीपी नेता जयंत पाटिल ने बताया कि महाराष्ट्र के लोग जानते हैं कि हिंदी एक वैकल्पिक भाषा है। लेकिन इसे अनिवार्य बनाने से महाराष्ट्र में काम नहीं चला। इसीलिए सरकार को त्रिभाषा नीति पर अपना सरकारी आदेश (जीआर) वापस लेना पड़ा।
मराठी पर हिंदी थोपने की कोशिश बर्दाश्त नहीं करेंगे: राज ठाकरे
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे ने कहा कि हिंदी भले ही व्यापक रूप से बोली जाती हो, लेकिन यह कोई राष्ट्रीय भाषा नहीं है जिसे अन्य राज्यों पर थोपा जाए। इसे मराठी से ऊपर रखने का प्रयास बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि लोग 150 से 200 साल पुरानी हिंदी भाषा को मराठी से श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसका इतिहास 3,000 साल से भी ज्यादा पुराना है। यह अस्वीकार्य है और मैं इसकी इजाजत नहीं दूंगा। मनसे प्रमुख ने कहा कि हिंदी राष्ट्रभाषा नहीं है जिसे अन्य राज्यों पर थोपा जाए। इस तरह का दबाव सही नहीं है।
फडणवीस सरकार ने रद्द किए सरकारी आदेश
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कैबिनेट बैठक के बाद रविवार को घोषणा करते हुए कहा, 'आज तीन-भाषा नीति पर मंत्रिमंडल में चर्चा हुई। हमने तय किया है कि डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में एक समिति बनाई जाएगी, जो यह तय करेगी कि किस कक्षा से कौन-सी भाषा लागू की जाए, कैसे की जाए और छात्रों को क्या विकल्प दिए जाएं।' उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक यह समिति अपनी रिपोर्ट सरकार को नहीं सौंपती, तब तक 16 अप्रैल 2025 और 17 जून 2025 को जारी दोनों सरकारी आदेश रद्द माने जाएंगे।'
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क्या था त्रिभाषा नीति विवाद?
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने आदेश जारी कर कहा था कि पहली से पांचवीं तक मराठी और अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में पढ़ाया जाएगा। इस पर कई शिक्षाविदों, मराठी भाषा प्रेमियों और भाषा सलाहकार समिति ने आपत्ति जताई थी। उनका तर्क था कि प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा पर ही ध्यान होना चाहिए, अन्यथा बच्चों की भाषा सीखने की क्षमता कमजोर होगी।