मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) को सौंपी अपनी रिपोर्ट में डॉक्टर इंद्रजीत खांडेकर ने कहा है कि इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है और इससे मानव अधिकारों का उल्लंघन होता है। ये लिंग असमानता को भी बढ़ावा देता है।
खांडेकर का कहना है कि उन्होंने इसकी कॉपी एमसीआई को भेज दी है। इसके अलावा रिपोर्ट की कॉपी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और महाराष्ट्र यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंस रजिस्ट्रार डॉक्टर केडी चंदावन को भी भेजी गई है। यह एक ऐसा टेस्ट होता है जिससे पता चलता है कि किसी महिला या लड़की ने शारीरिक संबंध बनाए हैं या नहीं। उन्होंने कहा कि दुष्कर्म के मामलों में भी ये टेस्ट किया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार 'वर्जिनिटी टेस्ट' उपयोगी क्लीनिकल टूल नहीं है और इंसान को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से परेशान करने वाला है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह टेस्ट वजाइनल इंटरकोर्स और इसके इतिहास के बारे में निर्णायक साक्ष्य नहीं देता है।
उनका कहना है कि कई किताबों में तो 'फॉल्स वर्जिन' और 'ट्रू वर्जिन' की जानकारी भी विस्तार से बताई गई है। किसी भी अन्य किताब में पुरुषों के लिए वर्जिनिटी टेस्ट के बारे में नहीं बताया गया है। इस टेस्ट को जल्द से जल्द मेडिकल पाठ्यक्रम से हटा लिया जाना चाहिए। इससे डॉक्टरों, आम लोग और अदालतों पर गलत प्रभाव पड़ता है।