बेटों को विरासत में मिले लोकसभा क्षेत्र
दुष्यंत भले ही तीसरी बार सांसद हैं, लेकिन क्षेत्र में वे अपनी मां के प्रभाव से ऊपर नहीं उठ पाए और लोग भी राजे को ही नेता मानकर उनके पक्ष में मतदान करते हैं। यही बात वैभव गहलोत पर लागू हो रही है। झालावाड़-बारां सीट से वसुंधरा राजे पांच बार सांसद रहीं, 2003 में झालरापाटन से विधानसभा गईं। वहीं, जोधपुर सीट से अशोक गहलोत पांच बार सांसद रहने के बाद इसी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सरदारपुरा सीट से लगातार पांचवी बार विधानसभा चुनाव जीते।
वैभव के सामने केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह
वैभव का मुकाबला केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत से है। अशोक गहलोत जानते हैं कि वैभव के लिए डगर काफी कठिन है। वैभव और वह अपने काम के आधार पर वोट मांग रहे हैं। इधर, शेखावत मोदी के हाथ मजबूत करने के लिए वोट मांग रहे हैं। गहलोत की सादगी के कारण लोग उन्हें 'मारवाड़ का गांधी' भी पुकारते हैं। वहीं, गजेंद्र छात्र राजनीति से आरएसएस व स्वदेशी जागरण मंच से भी जुड़े रहे। उन्हें व्यवहार कुशल व जमीन से जुड़ा नेता माना जाता है।
बेटों के लिए पहुंच रहे अपने-अपने गढ़
गहलोत और वसुंधरा प्रदेशभर में जनसभाओं, आलाकमान की रैलियों में उपस्थित रहने व बैठकों में शामिल होने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। पर, मौका मिलते ही बेटों के लिए अपने-अपने गढ़ में पहुंच रहे हैं और जनसम्पर्क में जुट जाते हैं। हाल ही पीएम मोदी ने कहा था कि गहलोत अन्य उम्मीदवारों को भूलकर केवल जोधपुर में बेटे के लिए गली-गली घूम रहे हैं। अगले दिन गहलोत ने कहा था कौन सा पिता अपने बेटे की सफलता के लिए दौड़-धूप नहीं करता।
जातियों की अंकगणित साधने में सभी जुटे
गहलोत यहां लोगों व स्थानीय नेताओं व सोसायटियों से व्यक्तिगत सम्पर्क में जुटे हुए हैं। वे एससी व एसटी के साथ जाट व विश्नोई समाज को भी साधने में लगे हैं। गहलोत जानते हैं कि अकेले माली समाज के वोटों से वैभव की नैया पार नहीं लग सकती। गजेंद्र का साथ यहां का सबसे बड़ा राजपूत वोट बैंक दे रहा है। करीब पांच लाख सवर्ण वोट से भी उन्हें उम्मीद है। वे राजपूतों के बराबर वोट वाले अन्य पिछड़ा वर्ग को अपने पाले में करने में भी जुटे हुए हैं।
वसुंधरा व दुष्यंत के अभेद्य गढ़ में कांग्रेस ने उतारा नया चेहरा
झालावाड़-बारां भाजपा, वसुंधरा राजे व दुष्यंत के लिए मजबूत और अभेद्य गढ़ रहा है। यहां चेहरा भले ही दुष्यंत हों, लेकिन वसुंधरा राजे को ध्यान में रखकर लोग भाजपा को वोट देते आए हैं। हर बार की तरह वसुंधरा ही दुष्यंत का चुनाव अभियान संभाल रही हैं। दुष्यंत तीन चुनाव जीते हैं और हर बार की तरह अपनी मां के साथ जमकर प्रचार कर रहे हैं, उनका गांव-गांव पहुंचने का प्रयास रहता है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने भाजपा के इस किले में झालावाड़ के स्थानीय नए चेहरे प्रमोद शर्मा से चुनौती दिलवाई है, जो गत दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा से बगावत कर कांग्रेस में शामिल हुए थे।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस नेता मानवेंद्र सिंह का साथ देते हुए वसुंधरा राजे की मुखालफत करने का इनाम उन्हें लोकसभा में कांग्रेस के टिकट के रूप में मिला है। भाजपा से कांग्रेस में शामिल हुए मानवेंद्र सिंह ने झालरापाटन विधानसभा सीट से वसुंधरा राजे को चुनौती दी थी और हारे थे। कांग्रेस को भी यहां से खाता खुलने का इंतजार है। यहां लोगों का कहना है कि इस चुनाव में पलड़ा एक बार फिर दुष्यंत सिंह का भारी नजर आता है। बीते 30 सालों से इस सीट से भाजपा को कोई हिला नहीं पाया। कांग्रेस की न्याय योजना की चर्चा सुनाई नहीं देती, यहां मुद्दा राष्ट्रवाद, मोदी और वसुंधरा हैं।