कानूनविद इस मामले पर सभी के लिए एक जैसा नियम-कानून बनाकर शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील कर रहे हैं, लेकिन इसी के साथ इस विवाद में समान नागरिक आचार संहिता की बढ़ती मांग की आहट भी सुनाई पड़ रही है। क्या इसी कारण एक वर्ग के द्वारा जानबूझकर इस विवाद को हवा देने की कोशिश की जा रही है? यह समझना भी जरूरी है कि जिस लाउडस्पीकर का विरोध मुस्लिम मौलाना स्वयं करते रहे हैं और इसे ‘शैतान की आवाज’ करार देते रहे हैं, वे आज इसके पक्ष में क्यों खड़े हैं?
तेज आवाज में अजान क्यों?
इस्लामिक मामलों के जानकार डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने अमर उजाला से कहा कि इस्लामिक धर्मग्रंथों में कहा गया है कि समूह में नमाज पढ़ने से अकेले में नमाज पढ़ने की तुलना में 70 गुना ज्यादा असर होता है। इसलिए नमाज पढ़ने के लिए ज्यादा लोगों को एकत्र करने की कोशिश की जाती थी। इसके लिए पुराने समय में किसी ऊंचे स्थान पर खड़े होकर तेज आवाज में अजान पढ़ी जाती थी जिससे आवाज ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके और वे नमाज के लिए एकत्र हो सकें।
लाउडस्पीकर को शैतान की आवाज बताया
लेकिन जब लाउडस्पीकर का आविष्कार हुआ तब इसके जरिए तेज आवाज में अजान पढ़कर लोगों को नमाज के लिए बुलाया जाने लगा। लेकिन इसी के साथ मौलानाओं के द्वारा इसका विरोध किया जाने लगा। क्योंकि यह एक मशीन से निकलने वाली आवाज थी (जो शरीर की तरह अल्लाह के द्वारा नहीं बनाई गई थी और इसलिए नापाक थी)। मौलानाओं ने इसे ‘शैतान की आवाज’ करार दिया और मस्जिदों से लाउडस्पीकर को दूर रखने की सलाह दी।
यह ठीक उसी तर्ज पर हुआ जैसे आज कई बार मौलाना टीवी का विरोध करते हैं। लेकिन बदलती दुनिया में मौलानाओं की आवाज कमजोर पड़ती गई और सुविधा के कारण मस्जिदों पर लाउडस्पीकरों की संख्या बढ़ने लगी। अब वे स्वयं ही इसका जमकर उपयोग करने लगे हैं।
कष्ट पहुंचाना गैर-इस्लामी कार्य
डॉ. फैयाज अहमद फैजी ने कहा कि इस्लाम में किसी भी निरपराध को किसी भी प्रकार का कष्ट देने को उचित नहीं कहा गया है। इस प्रकार यदि लाउडस्पीकर से किसी को स्वास्थ्य मामलों की परेशानी होती है, और उसके बाद भी इसे चलाया जाता है तो यह गैरइस्लामिक कार्य है। सेहरी में सुबह कुछ खा-पीकर रोजा रखने के पीछे यही तर्क था कि जिससे शरीर को कोई कष्ट न हो। ऐसे में जब लाउडस्पीकर से उसी शरीर (मुस्लिम या किसी भी अन्य धर्म के लोग) को कष्ट होने लगे तो उसे इस्लाम की दृष्टि में सही नहीं कहा जा सकता।
सऊदी अरब में लाउडस्पीकर के सीमित प्रयोग की अनुमति
मस्जिद पर लाउडस्पीकर लगाना इस्लाम धर्म का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। यह केवल लोगों को नमाज के समय की सूचना देने का एक माध्यम माना जा सकता है। लेकिन बदले समय में नमाज के समय की सूचना देने के अनेक माध्यम सामने आ चुके हैं। रमजान शुरू होने से पहले इस्लाम के अलग-अलग फिरकों के नमाज का पूरा कैलेंडर लोगों तक पहुंच जाता है। वे इसके मुताबिक नमाज पढ़ सकते हैं। लिहाजा अब केवल नमाज के समय की सूचना देने के लिए मस्जिदों पर लाउडस्पीकर लगाने की कोई आवश्यकता नहीं रही।
विशेषकर यह देखते हुए कि तेज होते शहरीकरण के दौर में शहर के आंतरिक स्थानों पर जगहें कम बची हैं। किसी भी शहर में मस्जिदों के आसपास में ही अस्पताल, स्कूल और अन्य संवेदनशील जगहें होती हैं जहां शांति की ज्यादा आवश्यकता होती है। आवासीय परिसरों में भी किसी को स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं, जिनके लिए शांति ज्यादा आवश्यक होती है। लिहाजा एक सामाजिक आवश्यकता समझते हुए किसी भी धार्मिक स्थल पर लाउडस्पीकर लगाने से बचा जाना चाहिए।
ध्यान देने की बात है कि सऊदी अरब जैसे शुद्ध इस्लामिक राष्ट्रों में भी मस्जिदों में लाउडस्पीकर के उपयोग को लेकर निर्देश दिए गए हैं। सऊदी अरब के इस्लामिक मामलों के मंत्री डॉ. शेख अल लतीफ अल-शेख ने 23 मई 2021 को एक सर्कुलर जारी करते हुए कहा था कि मस्जिदों में केवल अजान और इकामत (नमाज के लिए तकबीर) के लिए लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति है। इस दौरान लाउडस्पीकर की क्षमता एक तिहाई ही होनी चाहिए। अधिक आवाज में लाउडस्पीकर चलाने पर दंड का प्रावधान है।
समान नागरिक संहिता की मांग की झलक
सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे ने अमर उजाला से कहा कि यह विवाद देश में कानून-व्यवस्था की गहरी समस्या पैदा कर सकता है। यदि मस्जिदों में अजान प़ढ़े जाने के समय मंदिरों से हनुमान चालीसा बजाया जाएगा, या मंदिरों में पूजा के समय उसके सामने कर्बला के गीत गाए जाएंगे तो इससे सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ेगा। इसलिए सरकार को सभी धर्म-समुदायों के लिए एकजैसा कानून बनाकर इस मामले को हल करने की कोशिश करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मंदिरों के ऊपर लाउडस्पीकर लगाने की मांग के पीछे भी यही प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है कि लोग सभी धर्मों के मतावलंबियों के लिए एक जैसा नियम-कानून चाहते हैं। किसी न किसी रूप से इसमें समान नागरिक आचार संहिता की बढ़ती मांग के संकेत दिखाई पड़ते हैं जो मूलरूप से संपत्तियों के बंटवारे और गोद लेने जैसे मामलों के लिए होता है।
विहिप की कोई योजना नहीं
- विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के राष्ट्रीय प्रवक्ता विनोद बंसल ने अमर उजाला से कहा कि यह मुद्दा केवल लाउडस्पीकर से पैदा होने वाले शोर तक सीमित नहीं है। इसे ज्यादा व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। पिछले 70 साल में हर अवसर पर हिंदू समुदाय को यह एहसास कराया गया कि वह अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक है। केंद्र और राज्य सरकारों के द्वारा हर अवसर पर मुस्लिम समुदाय को विशेष प्राथमिकता दिए जाने से लोगों से लोगों में गहरा असंतोष पैदा हुआ है।
- हिंदू समाज अपने लिए विशेष छूट या विशेष सुविधा की मांग नहीं कर रहा है। वह केवल इतना चाहता है कि यदि मस्जिद पर लाउडस्पीकर लगाने की अनुमति मिलती है तो उसे भी मंदिरों पर लाउडस्पीकर लगाने की छूट मिलनी चाहिए। यदि लाउडस्पीकर से प्रदूषण पैदा होता है तो दोनों ही समुदायों के धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर लगाने पर प्रतिबंध लगना चाहिए। उन्होंने कहा कि हिंदू समुदाय अब यह बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं है कि किसी एक समुदाय (मुस्लिम) को लाउडस्पीकर लगाने की अनुमति मिले जबकि उसे (हिंदू समुदाय) यह अनुमति न मिले।
- उन्होंने कहा कि विश्व हिंदू परिषद देश के सभी मंदिरों पर लाउडस्पीकर लगाने जैसी किसी योजना पर कार्य नहीं कर रहा है। उनका कार्य केवल हिंदू समाज के हित से जुड़े मुद्दों को उठाना है। यदि किसी अवसर पर आवश्यकता होगी तो उनका संगठन केवल हिदुओं के हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा, लेकिन लाउडस्पीकर लगाने जैसे कार्यों में संलग्न नहीं होगा।