कुछ इतिहासकारों की राय है कि हंपी या विजयनगर राजवंश की पूर्ववर्ती राजधानी के आसपास का क्षेत्र किष्किंधा क्षेत्र है। उनका दावा है कि हंपी में पुरा-ऐतिहासिक काल की अनेक शिला कलाकृतियों में पूंछ वाले लोगों को चित्रित किया गया है। संगमकल्लू, बेलाकल्लू के पास अनेक गुफा कृतियों में मनुष्य के साथ पूंछ जैसी आकृति देखी जा सकती है। इतिहासकारों की ओर से यह दलील दी जा रही है कि वानर मनुष्य जाति की ही एक प्रजाति है, जिसकी पूंछ होती है। बेंगलुरु स्थित चित्रकला परिषद में कला इतिहास विभाग के प्रमुख और प्रोफेसर डॉ. राघवेंद्र राव कुलकर्णी के अनुसार संभवत: त्रेता युग और भगवान राम के समय इन्हीं लोगों ने उनकी मदद की होगी।
विवाद सुलझाने को कलाकृतियों को बनाया आधार
धारवाड़ विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर ए सुंदर ने बेल्लारी क्षेत्र में अनेक ऐसी पेंटिंग चिह्नित की हैं, जिनमें मनुष्य के पीछे की तरफ एक छोटा सा बाहरी हिस्सा दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि हंपी में और उसके आसपास 1,000 से अधिक हनुमान मंदिर हैं। उन्होंने कहा कि हनुमान जी से जुड़ी कृतियां हंपी क्षेत्र में ही क्यों हैं और तिरुमला में क्यों नहीं हैं?
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सेवानिवृत्त अधीक्षण पुरातत्वविद टीएम केशव ने कहा कि उन्होंने रामायण में वर्णित किष्किंधा के सभी भौगोलिक क्षेत्रों को चिह्नित किया है। केशव ने कहा कि सभी रिकॉर्ड, उपलब्ध साक्ष्य, मौजूदा परंपराएं तथा लोक श्रुतियां दर्शाती हैं कि पूर्ववर्ती विजयनगर राज्य, जिसे पहले पंपा क्षेत्र कहा जाता था, को किष्किंधा के रूप में पहचाना गया है, जहां सैकड़ों हनुमान मंदिर हैं।
किसके दावे में दम रिपोर्ट आने पर पता चलेगा
अब सवाल उठता है कि कोप्पल का गोकर्ण, उत्तर कन्नड़ का गोकर्ण या फिर तिरुपति की अंजानाद्रि पहाड़ी आखिर कहां हनुमान का जन्म हुआ था? इस विवाद को सुलझाने के लिए तिरुमला तिरुपति देवस्थानम के विशेषज्ञों का एक पैनल बनाया गया है। इस पैनल में वैदिक जानकार, पुरातत्व विशेषज्ञों के साथ ही इसरो के वैज्ञानिक भी शामिल हैं। 21 अप्रैल को ये एक्सपर्ट्स पैनल अपनी रिपोर्ट सौंपेगा।